नहीं रहे हिंदू मुस्लिम एकता के प्रतीक शेख करीम खान

-रिपोर्ट नंदकिशोर अग्रवाल
पिथौरा (काकाखबरीलाल) । मंगलवार की दरमियानी रात करीब 10:00 बजे पिथौरा के हिंदू और मुस्लिम समुदाय को एकता का पाठ पढ़ाने वाले रामायणी शेख करीम का 77 वर्ष की उम्र में आज निधन हो गया। उनके निधन से पिथौरा में रामायण प्रेमी तथा साहित्य जगत् में एक खालीपन आ गया है। तथा पूरा पिथौरा उनके निधन पर स्तब्ध है। शेख करीम का जन्म बसना में सन 1942 में हुआ तथा 5 वर्ष की उम्र में ही वे पिथौरा आ गए। अपने युवा पन से ही उनका झुकाव रामायण की ओर हो गया और वे पिथौरा ही नहीं बाहर भी रामायण का पाठ करने के लिए अपनी टीम के साथ जाते थे ।एवं जगह-जगह होने वाले नवधा रामायण मैं बढ़-चढ़कर इस प्रतिस्पर्धा में भाग लेते थे। तथा अपना स्थान अव्वल करते थे। इनके रामायण पाठ पर पिथौरा ही नहीं बाहर भी चर्चे होते थे कि आखिर एक मुसलमान इतनी कुशलता से कैसे रामायण पाठ कर लेते हैं ।वास्तव में वे हिंदू और मुस्लिम समुदाय को एकता में पिरो कर रखने वाले जादूगर थे। पुराने समय से ही उनके निर्देशन में दशहरा उत्सव में प्रतिवर्ष रामलीला मैदान में राम लीला का मंचन होता था। उनकी शख्सियत को देखते हुए कई बार इनका साक्षात्कार कई अखबारों में प्रकाशित हुआ। साक्षात्कार में मैं अपनी बातें बड़ी बेबाकी से रखते थे ।तथा रामायण के बारे में कहते थे की रामायण को धर्म से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। वास्तव में रामायण गागर में सागर है तथा यह काव्य मनुष्य को आदर्श स्थापित करने का एक माध्यम है ।धर्म की बात पर शेख करीम हमेशा कहते थे की आस्था पर धर्म को कभी आड़े नहीं आना चाहिए। बहरहाल पिथौरा शहर के जाने-माने रामायणी शेख करीम के अवसान पर साहित्यकारों ने कहा एक अवसान का अंत हो गया वहीं पिथौरा के नागरिकों ने तथा साहित्यकार एवं रामायण प्रेमियों ने रामायण प्रेमी हिंदू मुस्लिम एकता के प्रतीक शेख करीम को भावभीनी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित की है। तथा कहा की वे हमेशा पिथौरा वासियों के दिलों में रामायणी के रूप में याद किये जाते रहगें।


























