पिथौरा:नैनो यूरिया और नैनो डीएपी के उपयोग से खेती की ओर बढ़ रहे किसान

पिथौरा। राज्य शासन की पहल पर किसानों को नैनो यूरिया एवं नैनो डीएपी के उपयोग के लिए लगातार जागरूक किया जा रहा है। महासमुंद जिले में इस अभियान का सकारात्मक असर देखने को मिल रहा है। वर्तमान में जिले के 10 हजार से अधिक किसान नैनो उर्वरकों का उपयोग कर बेहतर फसल उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
कृषि विभाग एवं इफको द्वारा किसानों के बीच नैनो उर्वरकों के वैज्ञानिक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए नियमित रूप से किसान प्रशिक्षण, खेत प्रदर्शन, ग्राम स्तरीय जागरूकता कार्यक्रम तथा तकनीकी मार्गदर्शन आयोजित किए जा रहे हैं। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में किसानों ने धान सहित अन्य फसलों में नैनो यूरिया एवं नैनो डीएपी को अपनाया है।
कृषि विभाग के अनुसार सहकारी समितियों में 500 मिलीलीटर पैकिंग की 17 हजार बोतल नैनो यूरिया उपलब्ध कराई गई है, जिनमें से 8,100 बोतलों का उठाव किसान कर चुके हैं। इसी प्रकार 12,400 बोतल नैनो डीएपी का भंडारण किया गया है, जिसके विरुद्ध 9,600 बोतलों का वितरण किसानों को किया जा चुका है।
विभाग द्वारा खरीफ अभियान एवं कृषक चौपालों के माध्यम से किसानों को नील हरित काई, हरी खाद, नैनो यूरिया एवं नैनो डीएपी के उपयोग के साथ जैविक एवं प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है।
विकासखंड पिथौरा के ग्राम लालमाटी के किसान गोविंद पटेल ने बताया कि उन्होंने धान की बुवाई से पहले प्रति किलोग्राम बीज में 5 एमएल नैनो डीएपी का उपयोग कर बीज उपचार किया। वहीं पहले से नैनो उर्वरकों का उपयोग कर रहे किसानों का कहना है कि इससे फसलों की वृद्धि संतुलित एवं स्वस्थ हुई है। पौधों द्वारा पोषक तत्वों का बेहतर अवशोषण होने से फसल की गुणवत्ता में सुधार हुआ है, जबकि रोग एवं कीटों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम होने से कीटनाशकों पर होने वाला खर्च भी घटा है।
71 किसानों ने तैयार की 220 क्विंटल नील हरित खाद
उप संचालक कृषि एफ.आर. कश्यप ने बताया कि 1 जून से 30 जून 2026 तक जिले में चलाए गए “खेत बचाओ अभियान” के तहत सभी विकासखंडों में कृषक चौपाल एवं संगोष्ठियों का आयोजन किया गया। अभियान के दौरान किसानों को नील हरित काई उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया गया। इसके परिणामस्वरूप जिले के 71 किसानों ने 91 टाकों में 220 क्विंटल नील हरित खाद तैयार कर अपने खेतों में उसका उपयोग शुरू कर दिया है। विभाग का मानना है कि इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी तथा मृदा स्वास्थ्य में भी सुधार आएगा।
































