युवाओं ने खोजा दोबे की पहाड़ियों के बीच पर्यटन स्थल; मान्यता- यहां देवता करते हैं वास, किले के आकार में दिखती कई चट्टान

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले के स्थानीय युवाओं ने एक और पर्यटन स्थल की खोज की है। बीहड़ों में स्थित दोबे की पहाड़ियों के बीच पत्थरों का एक गांव बसा हुआ है, जिसे पत्थरों का परिवार भी कहा जाता है। पहाड़ पर घास के सपाट मैदान, बीच में गुजरता नाला और इन सब के बीच दूर तक पत्थरों की अद्भुत कलाकृतियां बनी हुई हैं। वहीं बीजापुर के उसूर ब्लाक में नीलम सरई और नम्बी जलधारा के बीच एक पहाड़ी है, जिसे स्थानीय लोग दोबे के नाम से जानते हैं। इस पहाड़ी पर एक या दो नहीं बल्कि सैकड़ों छोटी बड़ी चट्टानें हैं। दोबे तक पहुंचने के लिए बीजापुर जिला मुख्यालय से सड़क मार्ग से आवापल्ली, फिर उसूर पहुंचने पर यहां सोढ़ी पारा से नीलम सरई तक पहाड़ी की चढ़ाई को पूरी करनी होगी। नीलम सरई से लगभग डेढ़ से दो किमी का घना जंगल और पहाड़ी रास्ते का सफर कर दोबे पहुंचा जा सकता है। पड़ाव में छोटे-बड़े पत्थरों के अलावा पहाड़ी नालों से सामना होता है। प्राकृतिक सुंदरता के बीच यहां कोसो दूर तक इंसानों की कोई बस्ती नजर नहीं आती है। बल्कि यहां दूर-दूर तक चट्टानों की बसाहट है। जो छोटे और बड़े आकार में है। इनमें कई ऊंची चट्टान किसी किले के आकार की दिखती है।
कई फीट ऊंची चट्टानों में खोह को देखकर आदिम युग का एहसास होता है। खोह के अंदर का एरिया काफी बड़ा है, जिसमें एक साथ दर्जन भर लोग आसानी से आ जाएं। स्थानीय ग्रामीणों की माने तो इन खोह में अक्सर जंगली जानवर होते हैं। शिकार के दौरान जब वो यहां पहुंचते हैं तो कोई भी एक खोह उनके ठहरने का स्थल होता है। गर्मियों के मौसम में चट्टानों के ऊपर विश्राम करते हैं, अचानक बारिश हो जाए तो खोह के भीतर शरण लेते हैं।
स्थानीय ग्रामीणों की माने तो दोबे पर देवताओं का वास है। रविवार-सोमवार की मध्य रात्रि पहाड़ पर बाजा, मोहरी, ढोल आदि पारंपरिक वाद्य के साथ नृत्य की ध्वनि सुनाई पड़ती है। सब कुछ अदृश्य होता है, लेकिन ध्वनि कानों तक स्पष्ट सुनाई पड़ती है। ग्रामीणों के अनुसार इस वक्त देवी-देवताओं क आगमन होता है और उनके स्वागत में ढोल, बाजा, मोहरी बजते हैं। इसके अलावा भी और कई रोचक कहानियां इन पहाड़ियों से जुड़ी हुई है।
नीलम सरई में पर्यटन को बढ़ावा देने वाली दर्शनीय बीजापुर नाम की स्थानीय युवाओं की टीम कुछ दिन पहले दोबे पहुंची थी। नीलम से आगे दोबे पहुंचकर टीम के सदस्यों ने एक खोह में रात बिताई। यहीं बोन फायर और कैंपिंग कर एडवेंचर का लुत्फ उठाया था। टीम के सदस्य रंजन दास कहते हैं कि प्रकृति को नुकसान ना पहुंचा कर भ्रमण के उद्देश्य से सैलानी यहां पहुंच सकते हैं। स्थानीय प्रशासन दोबे तक सैलानियों की पहुंच आसान बनाने और सुरक्षात्मक पहलुओं को ध्यान में रखकर ठोस कदम उठाए तो आने वाले दिनों में दोबे सैलानियों के लिए रोमांच भरे पर्यटन से कम नहीं होगा।























