बसना:ढैंचा की हरी खाद से सुधरेगी मिट्टी की सेहत, किसान हिमांशु बने प्रेरणा

ढैंचा की हरी खाद से सुधरेगी मिट्टी की सेहत, किसान हिमांशु बंजारे बने प्रेरणा
बसना। जिले के विकासखंड बसना अंतर्गत ग्राम बड़ेसाजापाली के प्रगतिशील किसान हिमांशु बंजारे ने जैविक एवं टिकाऊ खेती को अपनाकर क्षेत्र के किसानों के लिए प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने अपने 0.80 हेक्टेयर कृषि रकबे में ढैंचा की हरी खाद की फसल बोई है, जो वर्तमान में लगभग 30 दिन की हो चुकी है।
किसान हिमांशु बंजारे ने बताया कि ढैंचा की फसल को खेत में पलटकर हरी खाद के रूप में उपयोग किया जाएगा। इससे भूमि की उर्वराशक्ति में सुधार होगा, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी तथा आगामी फसल की उत्पादकता में वृद्धि होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि जैविक खेती अपनाने से खेती की लागत कम होने के साथ-साथ मिट्टी का स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहता है। उन्होंने अन्य किसानों से भी अपील की कि वे ढैंचा जैसी हरी खाद वाली फसलों का उपयोग कर प्राकृतिक एवं टिकाऊ खेती को बढ़ावा दें।
उप संचालक कृषि श्री एफ.आर. कश्यप ने बताया कि हरी खाद ऐसी फसलें हैं, जिन्हें विशेष रूप से मिट्टी की उर्वरता और संरचना को बेहतर बनाने तथा बनाए रखने के लिए उगाया जाता है। इन फसलों को सीधे खेत में पलटकर अथवा खाद बनाकर पुनः मिट्टी में मिलाया जाता है। हरी खाद के लिए सन, ढैंचा, लोबिया, उड़द, मूंग और ग्वार जैसी दलहनी फसलों का उपयोग किया जा सकता है।
उन्होंने बताया कि इन फसलों की वृद्धि तेजी से होती है तथा कम समय में अधिक जैविक पदार्थ उपलब्ध हो जाता है। इनकी पत्तियां अधिक संख्या में एवं वजनदार होती हैं तथा इन्हें कम उर्वरक और पानी की आवश्यकता होती है। बोआई के 35 से 40 दिनों के भीतर, फूल आने से पहले फसल को खेत में पलटने पर प्रति हेक्टेयर लगभग 50 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन की आपूर्ति होती है।
उन्होंने कहा कि हरी खाद के उपयोग से मिट्टी भुरभुरी होती है, वायु संचार एवं जलधारण क्षमता में वृद्धि होती है तथा मिट्टी की अम्लीयता और क्षारीयता में सुधार आता है। इसके साथ ही मृदा क्षरण में कमी आती है और मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या एवं सक्रियता बढ़ने से भूमि की उर्वरा शक्ति और उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। कृषि विभाग द्वारा किसानों को हरी खाद के उपयोग के प्रति लगातार जागरूक एवं प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि प्राकृतिक एवं टिकाऊ कृषि को बढ़ावा मिल सके।

































