रायपुर

आलोक शुक्ला ने संसदीय मंत्री प्रहलाद पटेल से मुलाकात कर 41 कोल ब्लॉक की नीलामी प्रक्रिया रद करने और हसदेव अरण्य वन संरक्षण की मांग की

रायपुर (काकाखबरीलाल).कोयला खान एवं संसदीय मंत्री प्रहलाद पटेल छत्तीसगढ़ के दौरे पर राजधानी रायपुर में हैं। उनसे छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला ने मुलाकात कर व्यावसायिक उपयोग के लिए की जा रही सभी 41 कोल ब्लॉक की नीलामी प्रक्रिया रद्द करने और हसदेव अरण्य जैसे वन समृद्ध क्षेत्रों के संरक्षण की मांग की है।
आलोक शुक्ला ने इस संबंध में मंत्री प्रहलाद पटेल से मुलाकात कर उन्हें ज्ञापन सौंपा है। जिसमें उन्होंने कहा है कि केन्द्रीय कोयला मंत्रालय ने “UNLEASHING COAL, New Hope for Aatmnirbhar Bharat” के नारे के साथ देश के 80 कोल ब्लॉको को व्यावसायिक उपयोग हेतु नीलाम करने की प्रक्रिया की शुरुवात की हैं l नीलामी सूची में शामिल 41 कोल ब्लॉक देश के समृद्ध, जैव विविधता से परिपूर्ण वन क्षेत्रों में स्थित हैं जो महत्वपूर्ण वन्य प्राणियों के रहवास और जीवनदायनी नदियों के जलागम क्षेत्र भी हैं l इन्ही वन और वन जमीनों पर आदिवासी एवं अन्य परम्परागत वन निवासियों की आजीविका और संस्कृति कई पीढियों से निर्भर हैं l 41 कोल ब्लॉक में से लगभग 14 कोल ब्लॉक केन्द्रीय वन पर्यावरण एवं क्लाइमेट चेंज मंत्रालय द्वारा घोषित NO Go क्षेत्र के हैं जिसमे खनन न करने की प्रतिबद्धता पूर्व में स्वयं मंत्रालय जाहिर कर चूका हैं l नीलामी की सूचि में शामिल अधिकतर कोल ब्लॉक संविधान की पांचवी अनुसूचित क्षेत्रों में हैं जहाँ ग्राम सभाए स्वशासन की इकाई के रूप में पेसा कानून 1996 और वनाधिकार मान्यता कानून 2006 के तहत अधिकार संपन्न हैं और इसके खिलाफ लगातार अपना विरोध कर रही हैं l यह नीलामी प्रक्रिया वर्ष 2014 में माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कोल घोटाले पर अपने एतिहासिक फैसले के भी विपरीत हैं l माननीय न्यायलय ने अपने फैसले में कहा था कि कोयला देश की बहुमूल्य खनिज संपदा हैं इसका इस्तेमाल देश की जरुरत के लिए सिर्फ अन्तः उपयोग के लिए ही होना चाहिए l इस नीलामी प्रक्रिया का स्थानीय समुदाय के साथ देशभर के पर्यावरण कार्यकर्त्ता, जन आन्दोलन, ट्रेड यूनियन और स्वयं सम्बंधित राज्य सरकारे अलग अलग मुद्दों पर विरोध कर रही हैं परन्तु सभी की चिंताओं से परे मंत्रालय नीलामी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में लगा हुआ हैं l दुखद रूप से मंत्रालय के द्वारा उपरोक्त समस्त तथ्यों को नजरंदाज कर सिर्फ कार्पोरेट घरानों की चिंताओं और मुनाफे के मद्देनजर कामर्सियल माइनिंग के लिए नीलामी की जा रही हैं l
छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन कमर्शियल माइनिंग के लिए नीलामी की इस प्रक्रिया का विरोध करता हैं एवं आपसे सादर निवेदन हैं हमारी बिन्दुवार निम्न आपत्तियों पर संज्ञान लेकर इसे तत्काल निरस्त करने की कृपया करें l देश की जरुरत की बजाए कार्पोरेट मुनाफे को प्राथमिकता – मंत्रालय ने नीलामी प्रक्रिया को आत्मनिर्भरता के लिए बढ़ा कदम बताया हैं परन्तु यह न तो यह समुदाय की आत्मनिर्भरता के लिए हैं और न देश की l कोल ब्लॉक कमर्शियल माइनिंग के लिए के दी जा रही हैं जिनका देश की जरूरतों से कोई लेना देना नहीं है बल्कि बढ़ा मकसद कोयले का निर्यात भी हैं | सरकारी आंकड़ों और कोल इंडिया लिमिटेड के vision – 2030 अभिलेख के अनुसार, भारत की अगले 10 साल तक की कोयला जरूरतों की आपूर्ति के लिए, कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) और वर्तमान में आवंटित खदानें पहले से ही सक्षम है l वर्ष 2015 के बाद नीलामी और आवंटन के जरिये दिए गए कोल ब्लॉको में से 60 कोल ब्लॉक अभी भी शुरू नही हो पाए हैं फिर इन नए कोल ब्लॉको की नीलामी की कोई आवश्यकता ही नही हैं l
कामर्सियल उपयोग के लिए कोयला उत्खनन पूर्णतया सूप्रीम कोर्ट के 2014 में कोलगेट मामले में दिये गए निर्णय कि मूल मंशा के विपरीत है जहाँ स्पष्ट कहा गया था की यह “राष्ट्रीय संपदा” है जिसका उपयोग जन-हित में देश कि जरूरतों के लिए ही किया जाना चाहिए | कामर्सियल माइनिंग कोर्ट के आदेश के पूर्ण विपरीत हैं l मंत्रालय के इस निर्णय से देश के महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों का विनाश और आदिवासियों का विस्थापन सिर्फ कार्पोरेट के मुनाफे के लिए किया जायेगा l नीलामी सूची में शामिल 41 कोल ब्लॉक देश के समृद्ध, जैव विविधता से परिपूर्ण वन क्षेत्रों में स्थित हैं जो महत्वपूर्ण वन्य प्राणियों के रहवास और जीवनदायनी नदियों के जलागम क्षेत्र भी हैं l इन्ही वन और वन जमीनों पर आदिवासी एवं अन्य परम्परागत वन निवासियों की आजीविका और संस्कृति कई पीढियों से निर्भर हैं l छत्तीसगढ़ में ही 9 कोल ब्लॉक में से 5 कोल ब्लॉक सबसे सघन, जैव विविधता से परिपूर्ण, हाथी का आवास क्षेत्र हसदेव अरण्य और मांड नदी के केचमेंट में हैं |
केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा वर्ष 2010 में इस पूरे क्षेत्र को “नो-गो” घोषित किया गया था जोकि पूरे देश के कोयला क्षेत्रों का 10 प्रतिशत से भी कम है | वर्तमान सरकार की “inviolate” नीति के दस्तावेज़ों को देखें तो इस क्षेत्र के अधिकांश ब्लॉक (20 में से 18) अभी भी “inviolate” माने गए हैं, देश के सभी कोलफ़ील्ड में से सबसे ज़्यादा ऐसे ब्लॉक हसदेव अरण्य में ही है | फिर भी नीलामी की सूची में यहाँ के 5 कोल ब्लॉकों को शामिल किया गया है, जबकि 7 का आवंटन पहले ही सार्वजनिक कंपनियों को किया जा चुका है | ऐसे में निश्चित है की पूरे क्षेत्र का, जिसको “छत्तीसगढ़ के फेफड़ों” के रूप में भी जाना जाता है, का विनाश हो जाएगा जिसकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगी | यह वन क्षेत्र हसदेव नदी पर निर्मित मिनीमाता बांगो बांध का केचमेंट भी जिससे लगभग तीन लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन पर सिचाई होती हे l इस वन क्षेत्र के विनाश से हसदेव नदी और बांगो बां ध पर भी गंभीर संकट पैदा हो जायेगा l नीलामी कि सूची में कई खदानें आदिवासी बाहुल पाँचवी अनुसूची क्षेत्रों में हैं जहां पेसा कानून 1996 तथा वनाधिकार कानून 2006 के तहत जन-समुदाय को विशेष अधिकार प्राप्त हैं, जिसके तहत खनन से पूर्व ग्राम सभाओं कि सहमति आवश्यक है | झारखण्ड के 9 में से 6 कोल ब्लॉक और छत्तीसगढ़ के सभी 9 कोल ब्लॉक पांचवी अनुसूची के हैं जिनकी नीलामी के पूर्व ग्रामसभाओ से सहमती लेनी चाहिए थी, परन्तु मंत्रालय ने इस तथ्य को नजरंदाज कर दिया जिससे आने वाले समय में कम्पनियों और समुदाय के बीच सीधे रूप से द्वन्द बढेगा l नीलामी के पूर्व ही हसदेव अरण्य कि ग्राम सभाओं कि ओर से 9 ग्राम पंचायतों के सरपंचो ने अपना विरोध व्यक्त कर प्रधान मंत्री को नीलामी ना करने का आग्रह किया हैं। परंतु ग्राम सभाओं के निर्णय को अस्वीकार कर नीलमी प्रक्रिया को आगे बढाया जा रहा हैं l
छत्तीसगढ़ में हाथी के रहवास वाले इलाको में खनन व अन्य गतिविधियों के कारण मानव हाथी संघर्ष की स्थिति दिन व दिन बढती जा रही हैं l प्रदेश के लगभग 16 जिले इस संकट से जूझ रहे हैं l वर्ष 2018 – 2019 में ही 14 हाथी और दर्जनों लोग अपनी जान गँवा बैठे हैंl नीलामी की सूचि में शामिल 9 कोल ब्लॉको में से 5 कोल ब्लॉक तो हाथी के रहवास और माइग्रेटरी कोरिडोर में स्थित हैं जिसे राज्य सरकार लेमरू हाथी रिजर्व के रूप में नोटिफाई करने की घोषण कर चूका हैं l अतः मानव हाथी रहवास के हसदेव अरण्य जैसे क्षेत्रों में खनन पर पूर्ण प्रतिबन्ध आवश्यक हैं l आज छत्तीसगढ़ के अधिकतर जिले विशेषरूप से करोबा रायगढ़, सरगुजा आदि खनन और अन्य औधोगिक परियोजनाओं के कारण पर्यावरण प्रदुषण की गंभीर समस्याओ से जूझ रहे हैं l कोरबा देश के सबसे प्रदूषित शहरो की सूची में शामिल रहा हैं l खनन परियोजनाओं और कोल वाशरी के कारण भूमिगत जल में प्रदुषण लगातार बढ़ रहा हैं l प्रदुषण के कारण स्थानीय समुदाय के स्वास्थ पर भी गंभीर दुष्परिणाम देखे जा रहे हैं l इन क्षेत्रों नई खनन परियोजनाओं की अनुमति से प्रदुषण की स्थिति और अधिक भयावह होगी साथ ही जिसकी भरपाई पुनः संभव नही हैं।

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छत्तरसिंग पटेल

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