छत्तीसगढ़

जयकुमार प्राकृतिक खेती कर ले रहे हैं अच्छी आमदनी

रायगढ़ जिले के लैलूंगा विकासखण्ड के भकुरा गाँव में रहने वाले श्री जयकुमार गुप्ता साधारण किसान नहीं, बल्कि नई सोच के प्रतीक हैं। बी.ए.तक शिक्षित जयकुमार ने नौकरी की राह छोड़कर खेती को ही अपना भविष्य बनाया और यह साबित कर दिया कि सही सोच और तकनीक से खेती भी लाभ का बड़ा माध्यम बन सकती है। जहाँ एक ओर कई किसान रासायनिक खेती की बढ़ती लागत से परेशान हैं, वहीं जयकुमार गुप्ता प्राकृतिक खेती के सहारे न केवल निश्चिंत हैं, बल्कि आत्मनिर्भर भी बन चुके हैं।

प्राकृतिक खेती कर रहे जयकुमार आज भी पशुधन को खेती की रीढ़ मानते हैं। उनके पास 3 गायें और 2 बैल हैं, जो उनकी खेती की आत्मा हैं। एक ही फसल पर निर्भर न रहकर वे धान, उड़द, मूंगफली और विभिन्न सब्जियों की खेती करते हैं। यह फसली विविधता न केवल उनकी आय को सुरक्षित करती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता को भी बनाए रखती है।

विज्ञान और परंपरा के संतुलन से वे जीवामृत, बीजामृत, नीमास्त्र, ब्रह्मास्त्र और हरी खाद का उपयोग करते हैं। ढैंचा और सनई जैसी फसलों से हरी खाद, फसलों के अवशेषों से कम्पोस्ट, फेरोमोन ट्रैप, लाइट ट्रैप और ट्राइकोडर्मा जैसे उपाय उनकी खेती को कीट और रोगों से सुरक्षित रखते हैं। केंद्र व राज्य सरकार की योजना नेशनल मिशन ऑन नैचुरल फार्मिंग तथा कृषि विभाग रायगढ़ का मार्गदर्शन उनके आत्मविश्वास को और मजबूती देता है।

जयकुमार गुप्ता की खेती के आंकड़े हर किसान को सोचने पर मजबूर करते हैं। प्राकृतिक खेती से वे प्रति एकड़ लगभग 20 क्विंटल उत्पादन प्राप्त कर रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि उनकी लागत मात्र ढाई हजार रुपये प्रति एकड़ आती है, जबकि शुद्ध मुनाफा लगभग 70 हजार रुपये प्रति एकड़ तक पहुँच जाता है। जयकुमार कहते हैं कि खेती में मुनाफा कमाने के लिए भारी खर्च नहीं, बल्कि सही ज्ञान, धैर्य और प्रकृति से तालमेल जरूरी है। प्राकृतिक खेती करके श्री जयकुमार गुप्ता अन्य किसानों के प्रेरणास्त्रोत बन चुके है।

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काका खबरीलाल

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