जिले के 1400 वर्ष पुराने साल वृक्ष को मिलेगा वीआईपी पहरा

रायपुर( काकाखबरीलाल). छत्तीसगढ़ को प्रकृति का खूब आशीर्वाद मिला है। यहां प्रकृति के अलग अलग रंग भी दिखते हैं। पर्यावरण दिवस को सार्थक करने वाली खबरें भी निकलकर आईं। जैव विविधता हैरिटेज घोषित करने की तैयारी में जुट गया है।
राज्य का 55 हजार 821 वर्ग किलोमीटर वन भूमि है। फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के जंगलों में 125 करोड़ से ज्यादा पेड़ हैं। इस लिहाज से प्रकृति ने छत्तीसगढ़ की धरा पर सबके रहने की व्यवस्था की है। इतनी भारी संख्या में पेड़ होने की वजह से राज्य के जंगल में अनेक प्रजाति के वन्यजीवों के साथ कई तरह के जीव जंतु यहां पल रहे हैं। साथ ही प्रकृति अपने अंदर कई रहस्य छिपा रखी है। इन जैव विविधता की पहचान करने के साथ संरक्षण करना बायोडायवर्सिटी के साथ वन विभाग के लिए एक बड़ी चुनौती है।
बायोडायवर्सिटी बोर्ड के सदस्य सचिव अरुण कुमार पाण्डेय के मुताबिक कोरबा स्थित सतरेंगा में 14 सौ साल पुराने साल वृक्ष, जिसे ग्रामीण अपना ठाकुर देवता मानते हैं, साथ ही महासमुंद जिले के ओडिशा बार्डर से सटे बाम्हनसारा गांव के 400 सौ साल पुराने वट वृक्ष को जैव विविधता हैरिटेज घोषित कर दोनों पेड़ के चारों तरफ को लकड़ी के बाड़े से घेरा जाएगा। साथ ही लोगों को पेड़ की जानकारी देने सूचना बोर्ड लगाने की व्यवस्था की जा रही है।
राज्य के सबसे बड़े ग्रास लैंड जंगल के रूप में विकसित गोमर्डा अभयारण्य में पिछले दिनों वन अफसरों की टीम ने 50 से ज्यादा बायसन के झुंड को कैमरे में कैद किया है। इस बात की पुष्टि गोमर्डा अभयारण्य के अधीक्षक आरके सिसोदिया ने की है। अफसर के अनुसार बायसन का यह झुंड पानी पीने तालाब जा रहा था, तब वनकर्मियों ने इस झुंड को वाच टॉवर से देखा और कैमरे में कैद किया। अफसर के अनुसार पौने तीन सौ किलोमीटर में फैले गोमर्डा अभयारण्य में वर्तमान में एक हजार से ज्यादा बायसन हैं। लेकिन यह कभी दस कभी बीस के झुंड में ही आजतक दिखे हैं। ऐसा पहली बार हुआ कि 50 से ज्यादा बायसन एक साथ नजर आए
धरमजयगढ़ वनमंडल में पिछले दिनों हरे रंग का एक ऐसा जंगली गिरगिट देखने को मिला, जो अपना रंग नहीं बदलता। संकट आने पर यह गिरगिट अपनी पूंछ को क्वाइल कर घेरा बना लेता है। कीट के जानकार गौरव निहलानी के मुताबिक इस गिरगिट का वैज्ञानिक नाम चमिलिअंस है। इसे आम बोलचाल की भाषा में झूलन टेटका कहते हैं। इस प्रजाति का गिरगिट उदंती-सीतानदी के साथ नारायणपुर, बस्तर के जंगल में देखने को मिलता है। इस गिरगिट को लेकर लोगों के मन में भ्रम है कि काम में जाते वक्त यह कहीं दिख जाए, तो बनता काम बिगड़ जाता है। इस वजह से इसे देखने पर लोग मार देते हैं। साथ ही लौटने पर उस मरे हुए गिरगिट की पूजा करते हैं।
कोरबा, महासमुंद के पुरातन पेड़ साल तथा बरगद को संरक्षित किया जाएगा। दोनों पेड़ को बायोडायवर्सिटी हैरिटेज घोषित किया जाएगा। साथ ही जैव विविधता से जुड़े सभी तरह के जीव जंतुओं का संरक्षण, संवर्धन किया जाएगा। – अरुण कुमार पाण्डेय, एपीसीसीएफ सदस्य सचिव जैव विविधता बोर्ड



























