बसना : 517 साल पहले ‘नानक सागर’ गांव में आए थे गुरुनानक देव , वहां आज तक कोई एफआईआर नहीं, 20 साल से निर्विरोध चुनाव

महासमुंद जिले में बसना से 8 किलोमीटर दूर जंगल और पहाड़ियों के बीच ‘नानक सागर’ गांव ने अपने गौरवशाली अतीत को सहेजकर अपने वर्तमान को भी गरिमामयी बना रखा है। इस गांव में 517 साल पहले सिखों के पहले गुरु नानक देव के चरण पड़े थे, इसलिए इसका अतीत दमकता है।
वर्तमान इसलिए गरिमामयी है क्योंकि सबसे पहले, यहां के हर मकान की दीवार गुलाबी है। हर गली में बगीचे हैं, पूरे गांव में कचरा खोजने से नहीं मिलता। गांव में ऐसा भाइचारा है कि कोई किसी के खिलाफ कभी थाना-कचहरी नहीं गया। लोकल थाने बसना में आज तक इस इलाके से एक भी एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। 2001 में आश्रित ग्राम से स्वतंत्र ग्राम पंचायत बनने के बाद अब तक यहां 4 पंचायत चुनाव हुए। आपसी मतभेद न हो इसलिए गांव के लोगों ने साथ बैठकर अपने बीच से किसी एक को मुखिया चुन लिया। मतदान की जरूरत कभी नहीं पड़ी।
नानक सागर गांव के सारे घर गुलाबी रंग के हैं। ऐसा करने के पीछे यह बताना है कि इस गांव में ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं है। सारे लोग एक समान हैं। इस गांव को गुलाबी ग्राम के नाम से ही जाना जाता है। यहां रोज सफाई भी होती है। ‘अतिथि देवो भव’ की परंपरा नानक सागर की संस्कृति है। यहां की महिलाएं मेहमानों के स्वागत में हुलहुली करती हैं, जिसे प्रायः भगवान की स्तुति या मांगलिक कार्यों के दौरान करने का विधान है। जानकारों के मुताबिक गुरुनानक देव पहली यात्रा के दौरान छत्तीसगढ़ आए थे, तब उन्होंने 2 दिन गढ़फुलझर में रानी सरोवर के पास निर्जन स्थान में बिताए थे। इसी दौरान वे रानी सागर भी गए थे, जिसे आज ‘नानक सागर’ के नाम से जाना जाता है।
20 साल पहले ग्राम पंचायत बना था ‘नानक सागर’ गांव
215 घर, 1056 की आबादी आश्रित गांव को मिलाकर
03 स्वच्छता पुरस्कार मिल चुके हैं पिछले 12 सालों में
आस्था; जिस जगह गुरु ने विश्राम किया था, वहीं सारे विवादों का हल
गांव के आखिरी छोर पर बने चबूतरे को नानक चौकी कहते हैं। माना जाता है कि गढ़फुलझर प्रवास के दौरान गुरुनानक इस गांव भी आए थे और विश्राम के लिए रुके। उसी जगह पर ग्रामीणों ने चबूतरा बनवाया है। इस पर लोगों की इतनी गहरी आस्था है कि पंच-सरपंच चुनने से लेकर गांव-घर के सभी विवादों का निपटारा इसी चबूतरे पर होता है। कुछ महीने पहले यहां जमीन को लेकर दो पक्षों के बीच विवाद हुआ था। इसकी शिकायत थाने तक पहुंची, लेकिन केस दर्ज होता उससे पहले ही चबूतरे पर बैठक हुई और मामला सुलझ गया। हर तीज-त्योहार पर पूरा गांव यहीं जुटता है और साथ में खुशियां मनाता है।
जिम्मेदारी; सफाई जरूरी, कोई नियम न माने तो घर के सामने रखते हैं कचरा
सफाई को लेकर गांव में इतनी जागरूकता है कि हर परिवार से एक सदस्य घर के साथ सामने की गली भी साफ करता है। पंच-सरपंच भी रोज इस काम में अपना हाथ बंटाते हैं। अगर कोई परिवार गांव से बाहर गया हो तो अगल-बगल के लोग उनके हिस्से की सफाई कर देते हैं। लेकिन कोई गांव में रहते हुए भी नियम माने तो पड़ोसी उसके घर के सामने कचरे का ढेर लगाने से भी नहीं चूकते। हर घर के बाहर पेड़-पौधों पर बोरियां लटकाई गई हैं। इन्हीं में गली का कचरा इकट्ठा किया जाता है। पाॅलीथिन मुक्त इस गांव को स्वच्छता के क्षेत्र में ओडीएफ, ओडीएफ+ और स्वच्छ निर्मल ग्राम जैसे पुरस्कार मिल चुके हैं।
तीर्थ स्थल बनाएंंगे
गढ़फुलझर ऐतिहासिक महत्व की जगह है। यहां हर जगह गुरु की निशानियां मिलती हैं। इसे प्रदेश में सिख समाज के बड़े तीर्थ केे रूप में विकसित करेंगे। -महेंद्र छाबड़ा, संयोजक-छत्तीसगढ़ सिख समाज


























