गुरु पर्व विशेष : जानिए गुरु गोबिंद सिंह जी से जुड़ी कुछ खास बातें

मनमीत सिंह छाबड़ा (पिथौरा)
विशेष रिपोर्ट। पौष शुक्ल सप्तमी विक्रम संवत् 1723 तदनुसार दिनांक 22 दिसंबर 1666 को माता गुजरी तथा पिता श्री गुरु तेगबहादुर जी के यहां पटना साहिब में एक ऐसे तेजस्वी बालक का जन्म हुआ था जिनकी आज 351वीं जयंती मनाई जा रही है। हम बात कर रहे हैं सिक्ख पंथ के दसवें और आखिरी गुरु गोबिंद सिंह जी के बारे में। जिनकी यह पंक्ति “सवा लाख से एक लड़ाऊं चिड़ियों सों मैं बाज तड़ाऊं तबे गोबिंदसिंह नाम कहाऊं” उनके जीवन को समझने के लिए पर्याप्त है। एक आदर्श व्यक्तित्व के धनी, सैन्य कौशल में निपुण वीर योद्धा के रूप में इतिहास हमेशा गुरु गोबिंद सिंह जी को याद रखेगा। उनके बारे में कुछ लिख पाना बहुत ही मुश्किल है मगर आइए जानें गुरु गोबिंद सिंह जी के जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें।
एक पुत्र के रूप में – अगर देखा जाए तो इतिहास में उनके जैसा दूसरा कोई पुत्र देखने को नहीं मिलेगा। जब कश्मीरी पंडितों के लिए संघर्ष की बात सामने आई तब गुरु गोबिंद सिंह जी ने ही हिंदू धर्म की रक्षा के लिए अपने पिता गुरु तेगबहादुर जी को शहीद होने का आग्रह किया था।
एक पिता के रूप में – इसी तरह अगर गुरु गोबिंद सिंह जी को एक पिता के रूप में देखें तो इतिहास में उनके जैसा कोई महान पिता भी नहीं हुआ होगा। जिन्होंने खुद अपने बेटों को शस्त्र दिए और कहा कि जाओ मैदान में दुश्मन का सामना करो और शहीदी जाम को पिओ।
एक लेखक के रूप में – अगर गुरु गोबिंद सिंह जी को एक लेखक के रूप में देखा जाए तो उनकी चंडी दीवार, गोबिंद रामायण नामक रचना साहित्य में विशेष महत्व रखती है।
एक योद्धा के रूप में – अगर एक योद्धा के रूप में गुरु गोबिंद सिंह जी को देखें तो आपको भी बड़ी हैरानी होगी क्योंकि उन्होंने अपने हर तीर पर एक तोला सोना लगवाया हुआ था। जब अन्य योद्धाओं ने तीर पर सोना लगवाने का कारण पूछते हुए कहा कि मरते तो इससे दुश्मन हैं फिर ये सोना क्यों? तो गुरु गोबिंद सिंह जी का जवाब था कि मेरा कोई दुश्मन नहीं है, मेरी लड़ाई जालिम के जुल्म के खिलाफ है। इन तीरों से जो कोई घायल होंगे वो इस सोने की मदद से अपना इलाज करवा कर अच्छा जीवन व्यतीत करें और अगर उनकी मौत हो गई तो उनका अंतिम संस्कार हो सके। यह सोच कोई साधारण योद्धा नहीं रख सकता।
एक त्यागी के रूप में – अगर एक त्यागी के रूप में गुरु गोबिंद सिंह जी को देखा जाए तो पता चलता है कि आनंदपुर के सुख, माँ की ममता, पिता का साया, बच्चों के मोह को आसानी से धर्म की रक्षा के लिए त्याग दिया।
एक गुरु के रूप में – गुरु गोबिंद सिंह जैसा गुरु भी कोई नहीं जिसने अपने को सिखों के चरणों में बैठकर अमृत की दात मंगाई और वचन दिया कि मैं आपका सेवक हूं जो हुकूम दोगे मंजूर करूंगा।



























