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चाय, इश्क और राजनीति EP 01 : “कांग्रेस: जिंदा पार्टी या मुर्दाघर का साया?”

प्रिय कांग्रेस, @INCIndia तुमसे कोई उम्मीद बची भी है या नहीं, ये अब सबसे बड़ा सवाल है। एक समय था जब तुम्हारा नाम सुनते ही लोगों के दिलों में देश का नक्शा बनता था। स्वतंत्रता आंदोलन की कहानियों से लेकर संसद की बहसों तक, तुम भारतीय राजनीति के धड़कते दिल हुआ करते थे। मगर अब...

“कांग्रेस: जिंदा पार्टी या मुर्दाघर का साया?”

 

 

प्रिय कांग्रेस,

तुमसे कोई उम्मीद बची भी है या नहीं, ये अब सबसे बड़ा सवाल है। एक समय था जब तुम्हारा नाम सुनते ही लोगों के दिलों में देश का नक्शा बनता था। स्वतंत्रता आंदोलन की कहानियों से लेकर संसद की बहसों तक, तुम भारतीय राजनीति के धड़कते दिल हुआ करते थे। मगर अब… अब तुम मुर्दाघर में पड़े उस जिस्म जैसे हो, जिसकी धड़कनें कभी लोगों को जिंदा रखती थीं।

लोकसभा में तुम्हें जो सौ के आसपास सीटें मिलीं, उसे अपनी रणनीति का करिश्मा मत समझना। ये जनता की ऊब थी, मोदी से मोहभंग था, और कुछ जगहों पर भरोसे का उम्मीदवार। वरना सच तो ये है कि तुम्हारी रणनीति, तुम्हारी जमीनी मेहनत, तुम्हारी विचारधारा, सब खोखले नारों में बदल चुके हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय की गलियों में रौनक खत्री जैसा नाम गूंजा। जिसने मटका क्रांति की, जिसने अपने विरोध को नारे और दीवारों से बाहर सड़कों तक उतारा। लोग रौनक को पहले पहचानने लगे और उसके बाद ही DU को। लेकिन कांग्रेस? तुम वही सीट हार गए। अब बताओ, इसमें कौन-सा बहाना दोगे? ABVP सालों से कैंपेन कर रही थी, छात्र-छात्राओं तक पहुँच रही थी, और तुम? तुम क्या कर रहे थे? पोस्टर चिपकाने का कॉन्ट्रैक्ट तक ठीक से नहीं निभा पाए।

और JNU! ओह, JNU का नाम आते ही लगता था मानो विचार की गंगा बहेगी। वहां जहां कभी लेफ़्ट का लाल रंग किताबों और गानों से चमकता था। वहां RSS और ABVP को तुमने जगह दी, सांस दी, और धीरे-धीरे पनपने दिया। आज वही JNU भगवाकरण की ओर बढ़ रहा है। और तुम खामोश खड़े हो, मानो ये तुम्हारी हार नहीं, बल्कि तुम्हारी आदत हो। जबकि तुम्हारे पास कन्हैया जैसा नेता था, जिसने एक वक्त पूरे देश का ध्यान खींचा। लेकिन तुम उसके बाद भी उसे दिशा नहीं दे पाए।

तुम छत्तीसगढ़ तक हार गए, तुम्हारे पास दो सबसे लोकप्रिय नेता होते हुए तुम राजस्थान भी हार गए।

तुम्हारे पास आज भी 40% वोट रिजर्व में है। वो लोग जिन्हें चाहे कुछ भी हो, कांग्रेस में ही रहना है। बस तुम्हें 20% और जुटाने थे। इतना ही। और तुम वो भी नहीं कर पाए। ये नाकामी सिर्फ़ तुम्हारी रणनीति की नहीं, तुम्हारी आत्मा की भी है।

राजनीति तब पलटती है जब तुम अपने विचारधारा को विरोधियों के दिलों में भी बो दो। RSS ने यही किया। 2014 से पहले उनका कोर वोट भी बिखर रहा था। लेकिन उन्होंने घर-घर जाकर, मोहल्लों में, गांवों में, रिश्तों में, धर्म और पहचान में अपना ज़हर और विचार दोनों घोल दिए। आज वे बूथ स्तर तक पहुँच गए हैं।

कांग्रेस, तुम क्या कर रहे हो? तुम्हारे पास न पैसे की कमी है, न इतिहास की। तुम्हारे पास नेहरू के सपने हैं, गांधी का खून है, आज़ादी की गाथा है। लेकिन तुम्हारे पास रणनीति नहीं है। तुम्हारी रगों में आज बस आलस्य बह रहा है। कभी तुम जनता के बीच का आंदोलन थे, आज तुम सिर्फ़ ट्विटर का ट्रेंड हो। कभी तुम्हारे हाथ में आज़ादी का परचम था, आज तुम्हारे हाथ में बस शिकायतों का पुलिंदा है।

कांग्रेस, तुम्हें अगर खुद को जिंदा करना है तो इतिहास की किताबों से बाहर आना होगा। आज़ादी दिलाने वाली पार्टी बनकर नहीं, आज की समस्याओं को हल करने वाली ताकत बनकर दिखना होगा। वरना वो दिन दूर नहीं जब तुम्हें लोग सिर्फ़ फुटनोट में पढ़ेंगे –“एक पार्टी जो कभी थी।”

– ख़त लिखने वाला लड़का।
चाय इश्क़ और राजनीति।

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काका खबरीलाल

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