अन्नदाता: रचनाकार शोभाराम पटेल

*कविता*
*’अन्नदाता”*
✍?✍? *लेखक- शोभाराम {राम} पटेल*✍?✍?
*”लहराती बलखाती अन्न की डाली खेतों में लगी अन्नदाता की हरियाली जिसकी महिमा गाएं दुनिया सारी, मिट्टी पुत्र हम कहलाए मेहनत की शान गाएं मिले मिट्टी में जब हम दुनिया ने हमें ठुकराया हैं, मेहनत से धरती के कण-कण को सिंजोया हैं, हर एक बंजर भूमि को उन्नत बनाया हैं तब जा के दुनिया को अन्न मिल पाया हैं, ये दुनिया जो हमें ठुकराती हैं हमारी मेहनत और हमारे नाम पर राजनीति जो कर जाते हैं, इनके घरों में भी हम अन्न पहुंचाते हैं, अपनी मेहनत की शान गाते हैं तब जा के अन्नदाता कहलाते हैं मिट्टी हमारी जान हैं अन्नदाता हमारी पहचान हैं ।।”*
“धरती को हल से चीर दुनिया को मेहनत की तर्ज बताते मिट्टी में मिल मिट्टी की खुशबू में महक जाते, पसीने की पानी से जलधारा बहाते परजीवी जीवों के साथ घुल-मिल जाते कीचड़ में जब सने हैं तब जा के अन्न ऊगे हैं, ये दुनिया जो हमें ठुकराती हैं हमारी मेहनत को गरीबी का नाम दे जाती हैं, इन शेरशाह के बंगलो में भी हमारी ही शाक-अन्न जाती हैं तब जा के इन महलों के हुकुमचंदो को दो वक्त की रोटी मिल पाती हैं, ये जो लोकशाह हमें कीचड़ बुलाते हैं इन कीचड़ से ही इनकी जीवन चलती हैं, हम माटी पुत्र किसान हैं अन्नदाता हमारी पहचान हैं ।।”
*’धरती को हल चीर बीज की उपज लगाते तपती धूप में तप जाते भरी बरसात को सह जाते, क्या ठंडी क्या गर्मी हर एक मौसम मे कलियों सा खिल जाते मिट्टी मे मिल हम मिट्टी बन जाते, अंकुर की हर एक कली बन जाते कीचड़ में सने हर डाली में हरियाली लाने, मिट्टी पुत्र हम कहलाते अन्नदाता लोग हमें बुलाते अंधेरी रात हो या तपती धूप, पुष की ठंडी हो या सावन की बरसात हर एक मौसम में तप के सह जाते, धरती को हल से चिर हरियाली की रौकन लाते दुनिया को पसीने की महक बताते, न द्वेष न बैर किसी से प्रेम से हम अन्न उगाते मेहनत की शान गाते माटी पुत्र हम किसान अन्नदाता हमारी पहचान ।।”*
रचनाकार→ आपका अग्रणी मित्र- *माटी पुत्र शोभाराम {राम} पटेल*
*ग्राम- परसदा बड़े, तह.- सारंगढ़, जिला- रायगढ़, छत्तीसगढ़, हिन्दुस्तान*
*मो- 7974629325*

























