छत्तीसगढ़

खेत बेच शुरू किया दृष्टिहीन बच्चों का स्कूल 40 छात्रों का है आसरा, रहने और भोजन की व्यवस्था फ्री

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के घरघोड़ा का अमलीडीह गांव। नेत्रहीन बच्चों के निशुल्क स्कूल ने इसे बाकी गांव से अलग कर दिया। 61 साल के वरुण प्रधान 7 साल से नेत्रहीन बच्चों का नि:शुल्क स्कूल चला रहे हैं। उनके स्कूल की शोहरत इतनी है कि आसपास के तीन-चार जिलों के कई गांव के 40 बच्चे यहां पढ़ने आ रहे हैं। छात्रों के रहने और भोजन की व्यवस्था पूरी तरह से फ्री है।

बच्चों की बढ़ती संख्या देखकर अब अलग से हॉस्टल बनवा रहे हैं। उनके जज्बे को देखकर गांव वाले खुद आगे आकर श्रमदान कर रहे हैं। वरुण को नेत्रहीन बच्चों के स्कूल खोलने की प्रेरणा अपनी भतीजी की पढ़ाई को लेकर आ रही दिक्कतों और बंद कमरे में रहने की मजबूरी को देखकर मिली। 2013-14 में उन्होंने स्कूल खोलने की सोची। पैसे नहीं थे। इसलिए जान पहचान वालों से कर्ज लिया। गांव में तीन कमरे का स्कूल शुरू किया। पैसे की कोई आवक नहीं थी। अपने ही रिश्तेदारों को अपने हिस्से का खेत बेच दिया।

वरुण अब अपने बेटे लोकेश के साथ स्कूल की इमारत व हॉस्टल बनाने में लगे हुए हैं। यहां वे नेत्रहीन बाल विद्या मंदिर स्कूल चलाएंगे। वरुण बताते हैं कि पहले जो स्कूल का कमरा था, वह किसी और की जमीन में बनाया था। उसने जमीन बेच दी तो अब गांव के ही शिल्लू चौधरी ने अपनी जमीन दान की है। 85 डिसमिल जमीन पर वे स्कूल बना रहे हैं। अब तक 15 लाख रुपए लग चुका है। उनके पास जितना पैसा था, वे उसमें लगा चुके हैं। स्कूल में 15 लड़के और 25 लड़कियां हैं। यहां कक्षा पहली से आठवीं तक के बच्चे पढ़ते हैं।

ईंट, छड़, रेत देने के बाद कर रहे है श्रमदान
स्कूल-हॉस्टल बनाने में किसी गांव वालों से ईंट तो छड़ मिली। कोई सीमेंट-मजदूरी के पैसे दिए। अब तक मजदूर वर्ग से लेकर पुलिसवाले, शिक्षक, फैक्टरी कर्मचारी, व्यवसायी, कुछ कर्मचारी संघ ने मदद की है। इसमें जीपीएल तमनार, खरसिया ठेकनाभाठा, जिंदल विवि के कर्मचारी, जवाहर मल, प्रदीप खरे व मित्र, कमल शर्मा, तरुणी गोंटिया, कमल साहू और एनटीपीसी कर्मचारियों ने निर्माण सामग्री-राशि तक दी है।

बच्चों को कमरों में बंद करके रखते थे
वरुण ने बताया कि छोटे भाई की बेटी जिसकी आंखों की रोशनी नहीं है, उसकी तकलीफ से यह ख्याल अाया। इसके बाद गांव समेत धरमजगढ़, पत्थलगांव, अंबिकापुर, कुुडुमकेला, सारंगढ़ समेत अन्य गांवों में गए और नेत्रहीन बच्चों को पढ़ाने के लिए तलाश किया। इस दौरान पाया कि परिजन ऐसे बच्चों को कमरे में बंद कर या रस्सी में बांधकर काम पर जाते थे। उन्हें समझाया और पढ़ने के लिए राजी किया। धीरे-धीरे बच्चे आना शुरू हो गए। अब उनके पढ़ने-रहने- भोजन के साथ कपड़े तक की व्यवस्था कर रहे हैं।

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छत्तरसिंग पटेल

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