600 साल पुरानी परंपरा यहाँ लगता है कलाकारों का बाजार

रायपुर (काकाखबरीलाल). रायपुर में पिछले साल के मुकाबले दिवाली की रौनक कम नजर आ रही है। शहर के पुरानी बस्ती के इलाके में एक बाजार ऐसा है जो सिर्फ दीपावली के मौके पर ही लगता है। इस बाजार में फुल, मिठाई, दीया नहीं बल्कि कलाकारों का सौदा होता है। यह कलाकार पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ यहां आते हैं। आस-पास के ग्रामीण इन्हें सौदा तय कर अपने साथ अपने इलाकों में ले जाकर दिवाली का जश्न मनाते हैं। यह कलाकार पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाते हैं और ग्रामीण नाचते-झुमते खुशी मनाते हैं। रायपुर के बूढ़ा तालाब के सामने पेड़ के नीचे इन कलाकारों की टोलियां जमा होती थीं। हर साल यहां 20 से 25 टोलियों में कलाकार आते थे। हर टोली में करीब 10 लोग होते थे। लेकिन इस साल दिवाली सुबह यहां सिर्फ तीन-चार टोलियां ही दिखीं। यहां इन टोलियों का सौदा करने आए कुलेश्वर यादव ने बताया कि कोरोना की वजह से असर पड़ा है। कलाकार नहीं आए और दाम भी बढ़ गए हैं। पिछले साल तक 20 से 25 हजार में बात पक्की हो जाती थी, अब तो शुरुआत ही 45 हजार से हो रही है। ओडिशा के बलांगीर से आए कलाकार बुधु तांडी ने बताया कि इस बार उतनी डिमांड नहीं है इसलिए कलाकार कम आए।
छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति के जानकार डॉक्टर रमेंद्र नाथ मिश्र ने बताया कि कल्चूरी राजाओं के वक्त से गड़वा बाजा की टोलिंया रायपुर में जमा हो रही हैं। लगभग 600 साल पुराना इनका इतिहास है। बूढ़ा तालाब के पास ही राजा का किला हुआ करता था, जहां इन दिनों मजार है। राजा का किला होने की वजह से वाद्य कलाकार इसी मुख्य स्थल पर जमा हुआ करते थे। यहां आने वाले ज्यादातर कलाकार ओडिशा के होते हैं। 90 के दशक में तो सप्ताहभर पहले से यहां वाद्य कलाकारों का बाजार लगता था। सड़कें जाम हो जाती थीं। यह कलाकार मोहरी, धापड़ा, लिंसा, चमथा जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्र की प्रस्तुति देते हैं। दिवाली के बाद गौरा-गौरी पूजा और गोवर्धन पूजा करने वाले इन्हें अपने साथ ले जाते हैं। इन वाद्य यंत्रों के बीच ही यह आयोजन होते हैं। इसके बाद पखवाड़ेभर यादव समाज का राउत नाचा (लोक नृत्य) होता है। यादव समाज के लोग इन्हीं वाद्य यंत्रों के साथ गांव की हर गली में घूमकर दोहे कहते हुए नाचते हैं। शहरों में उन घरों में भी इसी अंदाज में जाते हैं, जहां साल भर दूध देते हैं। सिर पर पगड़ी हाथ में लाठी और रंग- बिरंगे कपड़े पहन कर पुरुष डांस करते हैं। कुछ पुरुष ही इसमें महिला बनकर नाचते हैं। खुशियों का उन्मुक्त होकर प्रदर्शन करते हैं।






























