कोरोना से बचने व्रत, तपस्या, आराधना, एकांतवास, परहेज जैसे नियमों का करें पालन : महंत रामसुंदर दास

रायपुर (काकाखबरीलाल).नवरात्रि का पर्व हमारे प्राचीन मनीषियों ने शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न करने के लिए ही बनाया है। यदि व्रत, तपस्या, आराधना, एकांतवास, परहेज जैसे नियमों का पालन करें तो इससे कोरोना जैसी महामारी का संक्रमण कम होगा। शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी यानी रोग पास नहीं फटकेगा। यह संदेश दुधाधारी मठ के महंत राजेश्री डाक्टर रामसुंदर दास ने श्रद्धालुओं को दिया है। नवरात्रि से पहले दिए संदेश में महंत ने अपील किया है कि कोरोना महामारी को देखते हुए नवरात्रि पर खास परहेज रखें, सार्वजनिक स्थानों पर न जाएं। अकेले ही पूजा पाठ, मंत्र जाप, आराधना करके आत्म शक्ति बढ़ाएं। उन्होंने कहा कि शरीर नाशवान है, संपत्ति और वैभव भी हमेशा रहने वाली नहीं है। मृत्यु हमेशा सिराहने पर खड़ी हुई है। इसलिए हमें निरंतर धर्म का संचय और धर्म का आचरण करना चाहिए। इसी में कल्याण निहित है। हिंदू नव संवत्सर का सदुपयोग आत्म कल्याण के लिए करें। इससे आपका लौकिक और पारलौकिक जीवन सुधर जाएगा। इस भौतिक जगत में शरीर धारण करने का इससे अच्छा लाभ कुछ और हो भी नहीं सकता। सात्विक आहार, विचार अपनाएं : महंत ने बताया कि सनातन धर्म में चार नवरात्रि हम लोग मनाते हैं, जिसमें दो प्रत्यक्ष और दो गुप्त नवरात्रि शामिल है। इसका सही सदुपयोग हम सबको अपने जीवन में आत्म कल्याण के लिए करना चाहिए। नौ दिनों तक सात्विक आहार, सात्विक विचार, सात्विक व्यवहार को अपने आचरण में समाहित करने का पूरा प्रयत्न करना चाहिए ताकि यह हमारे दिनचर्या का एक अंग बन सके। हमारे प्राचीन मनीषियों ने नवरात्रि के पर्व को अपने आत्म कल्याण एवं आत्मोन्नति के मार्ग को प्राप्त करने के लिए सृजित किया है। इसमें योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत, पूजा इन सभी का अत्यधिक महत्व है। हमें अपनी क्षमता के अनुसार इनका अनुसरण करना चाहिए याद रहे यह सब आध्यात्मिक क्रिया हमारे दैनिक नित्य क्रिया का एक अंग है लेकिन नवरात्रि काल में इसका विशेष महत्व है।
इससे हमारी आंतरिक शक्ति जागृत होती है, जिसका उपयोग हम स्वयं आत्म कल्याण के साथ सामाजिक विकास के लिए कर सकते हैं। ध्यान रहे जब तक आपके शरीर में जीवात्मा है, तभी तक आपके शरीर का महत्व है। मृत शरीर को तो बंधु- बांधव और स्वजन भी ढेले या काष्ट दंड की तरह शमशान में छोड़ कर वापस चले आते हैं। कोरोना से बचने अध्यात्म के जरिये अपने को मजबूत करें : धर्म शास्त्रों में लिखा है मृतं शरीरमृतसृज्य काष्ठलोष्टसमं क्षितौ। विमुखा बांधवा यान्ति धर्मस्तमनुतिष्ठति।
नवरात्रि के अवसर पर सात्विक आहार, व्यवहार का आध्यात्मिक उपदेश इसलिए भी लाभकारी है कि इससे शरीर की आंतरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है ग्रीष्म, वर्षा, शीत एवं शरद इन चार ऋ तुओं के संक्रमण काल में एक ऋ तु की समाप्ति और दूसरे ऋ तु का शुभारंभ होता है। संक्रमण काल में वायुमंडल में वायरस अत्यधिक सक्रिय हो जाते हैं। इससे विभिन्न तरह के रोग उत्पन्न हो जाते हैं।इनसे बचाव के लिए ही सनातन धर्मावलंबियों में समुचित आहार, व्यवहार, विचार को शुद्ध रखने की परंपरा है जिसे वर्तमान में विज्ञान ने भी स्वीकार किया है। अभी कोरोना वायरस के महामारी से संपूर्ण विश्व जूझ रहा है नवरात्रि के आध्यात्मिक नियमों का अपने जीवन में पालन करके हम इसके संक्रमण को कम करने में अपनी महती भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं।

























