
छत्तरसिंग पटेल।सरायपाली,-जीवन में बहुत कुछ होने के बावजूद भी एक इंसान के जीवन में मित्रता एक मूल्यवान रिश्ता है। कोई भी व्यक्ति जीवन को पूरी तरह से संतोषजनक नहीं बीता सकता अगर उसके पास भरोसेमंद मित्र नहीं है। सभी को जीवन की अच्छी बुरी यादें, असहनीय घटना और खुशी के पल को साझा करने के लिए एक अच्छे और निष्ठावान मित्र की जरुरत होती है । छत्तीसगढ़ के लोग सीधे और सरल स्वभाव के होते हैं ये अपने संबंध को प्रगाढ़ बनाने के लिए जाति विशेष से परे को साक्ष मानकर मितान जैसी परंपरा को निभाते हैं । छत्तीसगढ़ में मितान शब्द का प्रयोग मित्र के लिए प्रयोग करते हैं मितान शब्द पुर्लिंग के लिए तथा मितानिन शब्द स्त्रीलिंग के लिए प्रयुक्त किया जाता है । छत्तीसगढ़ की एक प्रमुख परंपरा के रूप में मितान परंपरा का महत्वपूर्ण स्थान है जिसमे स्त्री किसी स्त्री से और पुरुष किसी पुरुष से मितान बदते हैं तथा इस परंपरा को पीढिय़ों तक निभाते हैं । मित्रता आज नहीं वरन प्राचीन काल से प्रसिद्ध है जिनमे राम -सुग्रीव, दुर्योधन -कर्ण, कृष्ण-सुदामा की मित्रता को भुलाया नहीं जा सकता है छत्तीसगढ़ में मित्रता के कई रूप हैं जिनमे कुछ प्रचलित निम्नलिखित हैं ।
गंगाजल – गंगाजल को पवित्रता का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है और इसी पवित्र जल को आदान प्रदान कर तथा एक दूसरे को तिलक लगाकर दो साथी परिवार और समाज के सामने मितान बनते हैं।
जंवारा – यह सम्बन्ध नवरात्रि के समय बनाया जाता है क्योंकि उसी समय माता का जंवारा बोया जाता है इस परंपरा में एक दूसरे को जंवारा भेंट किया जाता है तथा एक दूसरे के कान में जंवारा को लगाया जाता है।
भोजली – मितान की इस परंपरा में सावन माह के शुक्ल अष्टमी के दिन टोकरियों में धान, गेंहू, जौ या उड़द के अंकुरित जिसे भोजली कहा जाता है को एक दूसरे को प्रेम पूर्वक भेंट किया जाता है।
महाप्रसाद – इस प्रकार के परंपरा में तीर्थ स्थलों चारोंधाम, जगन्नाथ पूरी, गंगा आदि के प्रसाद को साक्ष मानकर मितान बदा जाता है ।
तुलसीदल – इस मितानी परंपरा का निर्वहन भागवत या तुलसी विवाह के दिन किया जाता है। इसमें माता तुलसी की पूजा अर्चना की जाती है तथा तुलसी के पत्ते और जड़ एक दूसरे को खिलाया जाता है।
गजामूंग – इस प्रकार के मितान बदई में मूंग के गजा अर्थात् अंकुरण को प्रसाद बनाकर मित्रता की शुरुआत की जाती है। यह परंपरा मुख्य रूप से रथ यात्रा के समय पूर्ण की जाती है ।
गोदना – गोदना जिसे आज टैटू के नाम से जानते हैं इसे गोदवा कर मितान बनाया जाता है इसमें एक मित्र दूसरे मित्र का नाम अपनी कलाई में गोदवाता है और मितानी परंपरा का निर्वहन करता है।
दोनापान – इस प्रकार के मितानी में एक दूसरे को तेंदू या सरई की दोनापत्ती व फूल देकर परिवार और समाज के समग्र रस्म निभाया जाता है।
सहीनांव – जब दो व्यक्तियों का एक ही जैसा नाम हो तो उन दोनों के द्वारा बदे गए मितान परंपरा को सहीनांव मितान कहा जाता है आदि
मितान छत्तीसगढ़ की एक ऐसी प्रचलित परंपरा है जिनमे सिर्फ एक व्यक्ति ही नहीं बल्कि दो भिन्न भिन्न परिवारों का रिश्ता पीढ़ी दर पीढ़ी के लिए जुड़ जाता है। मितान रिश्ता इस प्रकार का होता है की उसमे एक दूसरे का नाम नहीं लिया जाता है। संबोधन में एक दूसरे से हमेशा राम राम, जय राम, जोहार जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है यह छत्तीसगढ़ की विशिष्ठ सांस्कृतिक परम्परा है जो अब वैश्वीकरण के दौर में विलुप्ति के कगार पर है।


























