
रायपुर(काकाखबरीलाल)। शिक्षाकर्मी से IPS बने इस माटी पुत्र का संघर्ष की चर्चाएं सभी जगह हो रही है छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के रहने वाले भोजराम पटेल की कहानी है,रायगढ़ ये वही जमीं है, जिसने राज्य बनने के बाद प्रदेश को पहला IAS अफसर ओपी चौधरी दिया था। इक्तेफाक देखिये IAS ओपी चौधरी और IPS भोजराम का गांव तारापुर आसपास तो है हीं..भोजराम अपने करियर का ओपी चौधरी को गॉडफादर भी मानते हैं। भोजराम ने 2013 में हुई यूपीएससी की परीक्षा में 323वां स्थान हासिल किया. भोजराम की जिंदगी की शुरुआत मां,पिता और उनकी दो बीघा जमीन से हुई।
मां-पिता जिसने भोजराम को संघर्ष सिखाया और उनकी दो बीघा जमीन उस संघर्ष की सारथी बनी। माता निरक्षर थी और पिता प्राइमरी पास,घर चलाने के लिए दो बीघा पुश्तैनी जमीन के अलावा कुछ था ही नहीं…थी तो बस वो सोच,आत्मविश्वास और वो लगन, जिसने छोटे से गांव के भोजराम को देश के सबसे इम्तिहान में कामयाबी का तोहफा दिया।
भोजराम बताते हैं कि उन्होंने गरीबी को सिर्फ करीब देखा ही नहीं,बल्कि गुजरे वक्त में हर पल जिया है। गुरबत का आलम ये था कि जिस दिन पेट भर खाना मिल जाता…वो दिन उनके और उनके परिवार के लिए सबसे खुशनसीबी का होता था। खेतों में पिता काम करते तो स्कूल के बाद भोजराम का वक्त भी खेतों में गुजरता…क्योंकि खेती के लिए मजदूरों को देने को पैसे नहीं थे। कभी मां-पिता दोनों खेत पर होते तो भोजराम के जिम्मे घर का चुल्हा चौका भी आता…क्योंकि दिन भर की मेहनत के बाद मां की हालत ऐसी होती नहीं थी कि वो खाना बना सके, लिहाजा घर में खाना बनाना भोजराम को ही पड़ता था।
खुद IPS भोजराम पटेल बताते हैं कि बचपन में खाना बनाने की वजह से वो आज वो बेहतर कुक भी हैं। बेशक वो आज करियर के सबसे ऊंचे मुकाम पर हैं, लेकिन अपने गरीबी के दिनों की याद आज भी उन्हें हमेशा मेहनतकश बनने और विपरीत हालात में हार ना मानने की सीख देते हैं। उन्हें वो दिन भी याद है, जब घर पर पूरा राशन नहीं होता था तो मां मां दाल व सब्जी में मिर्च अधिक डाल देती थीं, ताकि भूख कम लगे और कम भोजन ही खाये।
वो कहते हैं ना संघर्ष हमेशा बढ़ने की प्रेरणा देती है,लेकिन जब संघर्ष पेट के भूख को शांत करने की हो, तो वो हमेशा बड़ा करने की प्रेरणा देती है। सरकारी स्कूल में पढ़े भोजराम ने पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश शुरू की। इसी दौरान उन्होंने शिक्षाकर्मी भर्ती परीक्षा पास की और वर्ग-2 शिक्षाकर्मी में उनका चयन हुआ। शिक्षाकर्मी बनने के बाद उन्होंने नौकरी शुरू की, लेकिन आंखों में ख्वाब तो UPSC का पल रहा था। लिहाजा शिक्षाकर्मी रहते-रहते ही भोजराम ने अपनी तैयारी शुरू कर दी।
कई रात आधे पेट खाकर सोने वाले भोजराम ने कठिन परिश्रम कर आखिरकार यूपीएससी की परीक्षा पास की। हालांकि उनका सपना आईएएस बनने का था, लेकिन रैंक मन माफिक नहीं मिला, जिसकी वजह से उन्हें IPS से ही संतोष करना पड़ा। साल 2007-08 से जुटे भोजराज ने अपनी तैयारी शिक्षाकर्मी की नौकरी पर रहते हुए पूरी की। यहां तक कि वे नियमित रूप से दिल्ली में भी नहीं रहे। उनके कुछ दोस्त दिल्ली में रहते हैं, उन्होंने तैयारी में मदद की। भोजराम पटेल को UPSC में 323वीं रैंक मिली थी।
तीन दिन पहले ही भोजराम पटेल ने बतौर SP करियर की पहली पोस्टिंग पायी है। उन्हें नक्सल प्रभावित कांकेर जिला में पहली पोस्टिंग मिली है। जिस संघर्ष के बूते उन्होंने करियर के शीर्ष मुकाम पर पहुंचे….बतौर SP उनसे कांकेर में भी करिश्माई कप्तानी पारी की उम्मीद की जा रही है।
छोड़ दी थी PSC मेंस की परीक्षा
पढ़ाई करते-करते ही भोजराम ने ठान लिया था कि करना तो कुछ बड़ा ही है। हां ये बात जरूर अलग है कि तब ये सोचा नहीं था कि IPS-IAS ही बनना है। 2007-08 में तैयारी शुरू हुई, भोजराम ने एक साथ यूपीएससी के साथ-साथ पीएससी का फार्म भी भर दिया। यूपीएससी की परीक्षा के पहले पीएससी की परीक्षा होनी थी, लिहाजा भोजराम ने पीएससी की प्रीमिलनरी एग्जाम दे दी, इक्तेफाक से सेलेक्शन भी मेंस के लिए हो गया। यहां उनके सामने दो रास्ते खड़े हो गये, कि क्या पीएससी में जाया जाये या फिर यूपीएससी पर ही फोकस किया जाये। ….आखिरकार फैसला हुआ पीएससी की परीक्षा नहीं देंगे और पूरा फोकस यूपीएससी पर ही रखेंगे। नतीजा आने में भले वक्त लगा, लेकिन साल 2013 में भोजराम पटेल ने यूपीएससी में झंडा गाड़ दिया और IPS बन गये।





























