कोरोना काल में 28 हजार ग्रामीण लौटे थे, अब फिर कर रहे पलायन

जिले में मुख्य रूप से रोजगार खेती-किसानी ही है। रोजगार गारंटी के तहत ग्रामीणों को काम तो मिलता है लेकिन हमेशा नहीं। एक गांव में जितना कार्य स्वीकृत होगा उतना ही रोजगार मिलेगा। ऐसे में बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार ही रहते हैं। वहीं दूसरी ओर जिले में उद्योगों की भी कमी है, जिसके कारण ही ग्रामीण काम की तलाश में अन्य राज्य पलायन करते हैं। अभी ग्रामीणों के पलायन का सिलसिला फिर से शुरू हो चुका है। बड़ी संख्या में ग्रामीण बोरिया-बिस्तर लपेटे बीवी-बच्चों के साथ जबलपुर, नागपुर और लखनऊ वाली बसों में सवार होते दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा लोग रायपुर और बिलासपुर भी जा रहे हैं। वहां से ट्रेन के माध्यम से चेन्नई, पुणे, सूरत, दिल्ली जैसे बड़े शहरों की आगे बढ़ते हैं।
लॉकडाउन में वापसी
किसी त्योहार के बाद ही लोग काम के लिए पलायन करते हैं और अगले किसी त्योहार के पूर्व वापस आते हैं लेकिन वर्ष 2020 में कोरोना काल के दौरान जब लॉकडाउन हुआ तो बड़ी संख्या में पलायन किए लोग परिवार सहित वापस हुए। बड़ी संख्या में लोग पैदल ही सफर करते रहे। जिला प्रशासन के माध्यम से इनकी गणना हुई तो पता चला कि 28 हजार २४६ लोग अन्य राज्यों से वापस कबीरधाम पहुंचे थे।गुड़ फैक्ट्री के लिए बाहर से मजदूर बुला रहे
कबीरधाम जिले में 300 से अधिक गुड फैक्ट्री है जहां पर मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के मजदूरों को करने के लिए बुलाया जाता है। क्योंकि जिले के ग्रामीण मजदूर तो अन्य राज्य काम की तलाश में पलायन कर जाते हैं। अन्य राज्यों में भी अधिक रोजी मजदूरी नहीं मिलती। केवल जीवनयापन ही हो पाता है।
बंधुआ मजदूर बना देते
कर्नाटक और आंध्रप्रदेश जैसे कई राज्यों में कबीरधाम से पलायन किए ग्रामीण कई बार बंधन बनाए जा चुके हैं। ठेकेदारों द्वारा उन्हें लगातार मजदूरी कराते हैं। मजदूरी नहीं देते केवल खाने के लिए राशन पानी देते हैं। ऐसे में ग्रामीण जिला प्रशासन व पुलिस प्रशासन से गुहार लगाती है। किसी तरह से संयुक्त टीम वहां पहुंचकर उन्हें छुडाती है। लेकिन यह ग्रामीण फिर से अन्य राज्य पलायन कर जाते हैं।



























