छत्तीसगढ़

देवउठनी एकादशी आजः तुलसी और भगवान शालीग्राम के विवाह के साथ शुरू होंगे विवाह

नन्दकिशोर अग्रवाल,काकाखबरीलाल/पिथौरा । कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी कहा जाता है। इसे देवोत्थान एकादशी, देवउठनी ग्यारस, प्रबोधिनी एकादशी आदि नामों से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। वहीं इस दिन शालीग्राम और तुलसी का विवाह भी किया जाता है। इस बार देवउठनी एकादशी 19 नवंबर सोमवार को धूमधाम से मनाई जा रहा है। देवउठनी एकादशी के साथ ही माना जाता है कि इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु चार माह की नींद से जागते हैं और इसके साथ ही सभी मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं। देवउठनी एकादशी के लिए बाजारों में गन्नों की ट्रॉलियां आ चुकी हैं।

10 रुपए का एक गन्ना

बसस्टैंड पर गन्नों का फड़ लगाए राजेश ने बताया कि इस बार गन्ना महंगा आया है। इसके कारण प्रत्येक गन्ने की कीमत 10 रुपए है। 5 गन्ने 50 रुपए के दिए जा रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस बार गन्ने दूसरे क्षेत्र भी से अधिक आए हैं, वहीं कई लोग डबरा क्षेत्र से भी गन्ने लेकर आए हैं।

तुलसी और शालीग्राम के विवाह के साथ शुरू होती हैं शादियां

देवउठनी एकादशी को अबूझ मुहूर्त माना जाता है। जिन युवक-युवती के विवाह की तिथि वर्षभर में भी नहीं निकलती है। वे देवउठनी एकादशी पर विवाह कर सकते हैं। देवउठनी एकादशी पर पहले भगवान को जगाया जाता है। साथ ही तुलसी और भगवान शालीग्राम का विवाह होता है। इसके बाद ही मांगलिक कार्य शुरू होते हैं।

देवशयनी एकादशी को भगवान विष्णु जाते हैं सोने

हिन्दू शास्त्रों व धर्मग्रथों के अनुसार आषाढ़ माह की शुक्लपक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु चार माह तक विश्राम करने के लिए क्षीरसागर में चले जाते हैं। इस दौरान सृष्टि के पालन की जिम्मेदारी भगवान शिव के कंधों पर आ जाती है।

देवउठनी एकादशी को कहते हैं देव दीपावली

भगवान विष्णु के नींद में होने के दौरान ही दीपावली मनाई जाती है। इस दिन दीपावली पर अकेले माता लक्ष्मी का पूजन किया जाता है। लेकिन देवउठनी एकादशी पर भगवान श्रीहरि विष्णु के साथ माता लक्ष्मी का पूजन होता है। इसलिए इसे देव दीपावली के नाम से भी जाना जाता है।

श्रीहरि विष्णु बन गए थे पत्थर

दैत्यराज जालंधर का वध करने के लिए श्रीहरि विष्णु को अपनी भक्त वृंदा के साथ छल करना पड़ा था। इसके बाद श्रीहरि विष्णु ने जालंधर का वध किया था। लेकिन सच्चाई पता चलने पर वृंदा ने भगवान श्रीहरि विष्णु को श्राप देकर पत्थर का बना दिया था। लेकिन बाद में माता लक्ष्मी और अन्य देवताओं के अनुरोध करने के बाद वृंदा ने श्रीहरि विष्णु को वापस सही सलामत ला दिया था। लेकिन इसके बाद वह सती हो गई थीं। उनकी राख से ही तुलसी के पौधे का जन्म हुआ था। तभी से भगवान शालीग्राम के साथ तुलसी के विवाह का चलन शुरू हुआ।जो परम्परागत ढंग से चला आ रहा है।

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