महांसमुद : युवा इंजीनियर डच गुलाब की खेती कर बेरोजगार युवाओ को दे रहा रोजगार

महासमुंद जिले का एक पढ़ा लिखा युवा इंजीनियर अपनी पैतृक खेती मालीडीह में डच गुलाब की आधुनिक फसल ले रहा है। उनकी बागवानी में हर तरफ खूबसूरत रंग-बिरंगे फूल नजर आते हैं। उन्होंने इसके लिए अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद लाखों के जॉब पैकेज भी छोड़ा है। इस खेती से आसपास गांवों के 30 पढ़े-लिखे बेरोजगारों को रोजगार मिला है। उनकी बागवानी में लहलहाते इन फूलों की खुशबू बेहद आकर्षक है। उन्होंने इस्टीमेट बनाकर सबसे पहले पालीहाउस से 50 प्रतिशत अनुदान में कर्ज लिया। फिर पुणे महाराष्ट्र से डच गुलाब की काप्टेड बड खरीदकर अपने खेतों में लगाया।
आसपास गांवों के शिक्षित बेरोजगारों को बागवाानी में काम दिया। देखते ही देखते अमन की बागवानी नीदरलैंड के डच गुलाबों, सेवंती और झरबेरा की खुशबू और रंगत से सज गया। न केवल राजधानी बल्कि पड़ोसी राज्य ओडिशा में भी इन फूलों की अच्छी मांग है। बताना जरूरी है कि महासमुंद जिले के लगभग 30 एकड़ जमीन पर डच गुलाब की खेती होती है। धीरे-धीरे महासमुंद की जमीन पर उगने वाली नीदरलैंड की डच गुलाब देश के कई राज्यों के बाजार में अपनी पहचान बना रही हैं। महासमुंद डच गुलाबों के लोकल हब के तौर पर विकसित हो रहा है।
महासमुंद के गांव मालीडीह निवासी युवा इंजीनियर किसान अमर चंद्राकार पिछले 5 बरसों से अपने खेत में नीदरलैंड के डच गुलाब की खेती करता है। साढ़े 4 एकड़ में उन्होंने पीले, लाल गुलाब के साथ-साथ, झरबेरी और सेवंती लगाया है। सेवंती भी आठ रंगों मसलन काले रंग को छोडक़र सभी रंगों में अपनी खूबसूरती बिखेर रही है। इस बागवानी से 6 माह में उन्हें गुलाब की स्टीक मिलना शुरू हो जाता है और रोजाना ढाई हजार गुलाब की स्टिक निकाल पाते हैं।
अमर का कहना है-छत्तीसगढ़ में ज्यादातर लोग धान की खेती करते हैं। साल में सिर्फ एक बार ही फसल ले पाते हंै। आधुनिक खेती में एक बार फसल लगाकर मुनाफा भी ज्यादा कमा सकते हैं और कम से कम 4 से 5 साल तक काम आता है। वो बताते हैं कि जिले में करीब 30 एकड़ में आधुनिक खेती से डच गुलाब का उत्पादन होता है। जो न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि ओडिशा तक इसे भेजते हंै। डच रोज की खेती में सरकार 50 प्रतिशत की सब्सिडी देती है और साल का खर्चा काटकर 12 लाख का मुनाफ ा हो ही जाता है। अमर ने अपने बागवानी में आसपास के गांवों के करीब 30 बेरोजगारों को काम पर रखा है। सारे कामगार गुलाब की खेती की अत्याधुनिक जानकारी रखते हैं।
मालूम हो कि इंजीनियरिंग में बी टेक की पढ़ाई कर चुके अमर की पुणे स्थित एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब लग चुकी थी। लेकिन अमर ने नौकरी करने के बजाय अपने परम्परागत खेती को आधुनिक रूप से आगे बढ़ाने की ठानी और शासन की योजनाओं से जुड़े। उन्हें मालूम हुआ कि प्रदेश में बड़े-बड़े फार्म में डच गुलाबों की खेती हो रही है और यह आय का एक बढिय़ा साधन भी साबित हो रहा है। लिहाजा अमर ने डच गुलाब की खेती करने की ठानी। पढ़े लिखे होने के कारण वे पहले प्रयास में ही जिला पंचायत सदस्य भी चुन लिए गए। इस वक्त वे जिला पंचायत में कृषि विभाग के सभापति हैं।
अमर का इरादा है कि एक रोल मॉडल के रूप में फूलों की खेती महासमुंद जिले में सेट हो और यहां के युवा नौकरी के पीछे न भागकर अपने खेतों में आधुनिक खेती करें। उनका कहना है कि महासमुंद जिला केंद्र सरकार के एनएचएम में नहीं है, जिले को इसमें किया जाए ताकि बागवानी करने वाले किसानों को और अधिक सब्सिडी मिल सके। अमर के मुताबिक किसान प्रदेश के गजानंद पटेल को खूबचंद बघेल सम्मान मिलने के बाद वे उनके कामों से प्रभावित हुए और किसानी की ओर रुझान बढ़ा।
























