छत्तीसगढ़

गीता जयंती विशेष : आध्यात्मिक प्रकाश- आशीष गौरचरण मिश्र

गीता जयंती

आचार्य आशीष गौरचरण मिश्र*

आध्यात्मिक प्रकाश

*?श्रीकृष्णजी द्वारा विविध प्रकार के चक्र छोडकर विविध प्रकार का कार्य किया जाना*

श्रीकृष्णजी ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता विशद करते समय अर्जुन के मन में व्याप्त अज्ञान का नाश करने हेतु ज्ञानचक्र छोडा । उसके पश्‍चात उन्होंने महाभारत के युद्ध में लडनेवाले कौरवरूपी दुर्जनों के नाश हेतु सूक्ष्म से उनपर सुदर्शनचक्र छोडकर तथा स्थूल से पांडवों के शस्त्रों से वार कर उनका विनाश किया । तत्पश्‍चात उन्होंने धर्मचक्र छोडकर अधर्म का नाश कर धर्मराज युधिष्ठिर के माध्यम से धर्मसंस्थापना की ।
*?श्रीमद्भगवद्गीता की आध्यात्मिक विशेषताएं*

श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान इतना विशेषतापूर्ण है कि उससे प्रत्येक के मन की शंकाओं का निराकरण होता है । इस ज्ञान में विद्यमान चैतन्य के कारण मन, बुद्धि, चित्त एवं अहं की शुद्धि होती है और आनंद की प्राप्ति होती है । गीता का ज्ञान एवं चैतन्य चिरंतरन टिकनेवाला है । प्रत्येक व्यक्ति के आध्यात्मिक स्तर के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को इस ग्रंथ के एक ही विषय के अलग-अलग भावार्थ समझ में आते हैं । गीता का ज्ञान इतना सकारात्मक है कि उसे ग्रहण करनेपर किसी को आई निराशा तथा उसके मन की नकारात्मक का तुरंत दूर होती है । गीता से प्रत्येक व्यक्ति को विभिन्न परिस्थितियों में आध्यात्मिक स्तर का जीवन जीने का उत्तम मार्गदर्शन मिलता है । इसके ज्ञान से साधना का योगमार्ग, प्रकृति, रूचि, वर्ण एवं भिन्न स्तरवाले साधकों को अचूक एवं परिपूर्ण मार्गदर्शन मिलता है ।
*?विविध स्तरोंवाले व्यक्तियों को श्रीमतद्भगवद्गीता में विद्यमान ज्ञान को विविध वाणियों के स्तरपर ग्रहण करना संभव होना*

अर्जुन का आध्यात्मिक स्तर ८० प्रतिशत से अधिक होने से भगवान श्रीकृष्णजी द्वारा उसे परावाणी से प्रदान किया गया ज्ञान सहजता से ग्रहण करना संभव हुआ । संतों का आध्यात्मिक स्तर ७० प्रतिशत से भी अधिक होने से उन्हें श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान पश्यंति वाणी के स्तरपर ग्रहण करना संभव होता है । ५५ प्रतिशत स्तर के आगे के साधकों को श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान मध्यमा स्तरपर ग्रहण होता है । सामान्य लोगों को श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान वैखरी वाणी से ग्रहण करना संभव होता है ।

*?श्रीगुरु जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्णजी का सगुण रूप होनेसे उनके द्वारा साधक एवं शिष्यों को श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान  सरल, सुलभ और बोलीभाषा में देकर मार्गदर्शन किया जाना*

प्रत्येक साधक अर्जुन की भांति है और वह इस भवसागर में फंसा है । उसे अपने नित्य जीवन को व्यतीत करने समय अर्जुन की भांति ही प्रश्‍न आते हैं और उसे अपने आंतरिक षड्रिपुओं से निरंतर संघर्ष करना पडता है । श्रीगुरु जगद्गुरु भगवान श्रीकृष्णजी के सगुण रूप होते हैं । भगवान श्रीकृष्णजी श्रीगुरु के रूप में सगुण से प्रकट होकर साधक एवं शिष्यों को सरल, सुलभ और बोलीभाषा में श्रीमद्भगवद्गीता का  ज्ञान प्रदान कर मार्गदर्शन करते हैं ।

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छत्तरसिंग पटेल

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