राह नही आसान, प्रभावित ग्रामीणों में करो या मरो की स्थिति, पेसा क़ानून के तहत मिले अधिकारों पर भी हनन..

– डिग्रीलाल जगत
रायगढ़ (काकाखबरीलाल) । आगामी 27 सितम्बर को गारे पेलमा सेक्टर -2 महाराष्ट्र पावर जनरेशन के कोयला उत्पादन के लिए एक आखरी प्रक्रिया पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए जन सुनवाई होनी है। इसके लिए तेजी से अग्रसर है और चहूँ ओर इसके क्रिया प्रतिक्रिया को लेकर चर्चाओ का बाजार गर्म हो गया है। दूसरी ओर प्रभावित गांव जो इस कोल ब्लॉक के खुलने का विरोध कर रहे है और जन सुनवाई निरस्त हो इसके लिए अपनी पूरी एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। औद्योगिक घराना और प्रशासनिक महकमा जन सुनवाई को सफल बनाने में लगा हुआ है।
एक तरफ अंधाधुन्द औद्योगिकरण से फैलते पर्यावरण प्रदूषण और जल जंगल जमीन के अंधाधुंध दोहन की वजह से आदिवासियों का विस्थापन और चली आ रही वनवासी परम्परा अब कुछ खत्म हो रही है। विस्थापन से मूल परम्परा रहन सहन तीज त्योहारों और जल, जंगल, जमीन हमेशा हमेशा के लिए नेस्तनाबूत हो जा रहे आदिवासी परम्परा देवी देवता का निवास स्थान पर अब विनाश के पांव पसरते जा रहे हैं और जो बचा है उस पर औद्योगिक घरानों की पैनी नजर है। इनमें से एक महाजेंको को आबंटित गारे पेलमा सेक्टर -2 है। इसमें फौरी तौर पर 12 गांव के लगभग 5 हजार परिवार और करीब 9 हजार एकड़ जमीन जहां अभी हरियाली है। देखते ही देखते वीरान हो जाएगा सारी परम्परा उसी मिट्टी में दबकर रह जाएगी । नदियां, वो हरे भरे जंगल, बचे खुचे वन्य जीव, जल जंगल जमीन वन संपदा सब कुछ उस विकास की भेंट चढ़ जाएगा।
महाजेंको की जन सुनवाई 27 सितम्बर 2019 को नियत कर दी गई है। 2 बार जनसुनवाई स्थगित होने के बाद पुनः से जन सुनवाई की तारीख की घोषणा सदस्य सचिव से कराया जाना है। जन सुनवाई नए सिरे से कराना था इनके ईआईए रिपोर्ट में खामियों के आधार पर याचिका लगाई गई थी जिस पर रोक लगाया लेकिन लेकिन तमाम कवायद के बाद भी उस पर पर्दा डालते हुए सदस्य सचिव की उपस्थिति में विधिवत पूरी प्रक्रिया अपनाने के बाद जनसुनवाई कराने कहा। आज भी उस ईआईए रिपोर्ट में आज वन्य जीव होने का कोई जिक्र नहीं है जबकि इधर का जंगल हाथियो का कॉरिडोर है हाथियो सहित अन्य जीवों का कोई उल्लेख नही है। जबकि यह हकीकत से कोषों दूर है। वन विभाग के भी औद्योगिक घराने हाथ बांध देते हैं वे ऐसी बात बताएंगे जो बात वही कुर्सी पर बैठ कर किया जाता है। बात जनसुनवाई पर्यावरणीय स्वीकृति के लिए है। ऐसे में जब ग्राम सभा प्रस्ताव सर्वोपरि होता है उसे तो नजर अंदाज कर ही दिया है ग्रामीणों की उठने वाली आवाज को कुचल दिया गया है पेसा कानून हो या कहने को ग्राम सभा प्रस्ताव सबसे ऊपर वाली बात सब कागजों में धरी की धरी रह गई। इन तमाम बाधाओ को तो मानो पैरों तले बेरहमी से कुचल कर औद्योगिक घराना अंतिम पड़ाव पर्यावरणीय स्वीकृति में पहुंच चुकी है और इसे भी शाम, दाम, दण्ड, भेद की नीति अपना कर पूरा करा लेने का माद्दा रखती है।
जन सुनवाई के दिन ग्रामीणों और प्रभावितों को उनके अभिव्यक्ति का दायरा कुछ इस तरह सीमित कर दिए जाने की पूरी प्रशासनिक और कॉरपोरेट रणनीति तैयार है। इसके लिए एक स्कूल कैम्पस तय कर दी गई है। जहां हर किसी को न तो अंदर जाने की इजाजत होगी और न ही हर किसी प्रभावितों को बोलने का अधिकार होगा। चंद गिने चुने ग्रामीण ही यहां तक पहुंच पाएंगे यह बात अलग है संगठन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओ द्वारा अपनी बात माइक पकड़ कर जोर शोर से तथ्यों को भी रखेंगे। उनकी बातों को कागजी कार्रवाई के तौर पर पॉइंट आउट कर दिखाया जाएगा कि उनकी बातों को गम्भीरता से लिया जा रहा है।
फिलहाल अभी पिक्चर बाकि है अंतिम पड़ाव पार करने और रोकने सब कुछ अपने- अपने तरीके से चलाए मान हैं। प्रभावित ग्रामीण अपने तरीके से होने वाली जन सुनवाई का पुरजोर तरीके से विरोध करने में जुटे हैं। कागजी कार्रवाई नीचे से लेकर ऊपर तक चल रहा है। ग्रामीण हों या सामाजिक संगठन अपने -अपने तरीके से तथ्यात्मक तरीके से नियम विरुद्ध होने वाली जन सुनवाई को रुकवाने कोर्ट और एनजीटी जा कर जन सुनवाई को रोकने की जुगत में लगे हुए हैं। खासतौर जब जल, जंगल, जमीन, खान खनन क्षेत्र की बात हो तब स्थानीय स्तर के जन चेतना मंच के राजेश त्रिपाठी और सविता रथ का नाम न लिया जाए तो बात बेमानी होगी। इनका प्रयास अंतिम क्षण तक बेहद ही ऊर्जा देने वाला और सकारात्मक होता है।























