सरायपाली:कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया

सरायपाली। हिन्दी दिवस के अवसर पर पूर्वा साहित्य मंच के तत्वावधान एवं वरिष्ठ साहित्यकार अमृत पटेल के संयोजकत्व, अध्यक्षता तथा छत्तीसगढ़ शब्द के संपादक अवधेश अग्रवाल की उपस्थिति में कवि सम्मेलन का आयोजन प्रतिभा पब्लिक स्कूल बालसी में किया गया।जिसमें अंचल के अनेक साहित्यकार सम्मिलित होकर अपना काव्य पाठ एवं साहित्यक विचार रखे।इस अवसर पर वंदेमातरम सेवा संस्थान के उपाध्यक्ष, साहित्यकार एवं आकाशवाणी कलाकार जन्मजय नायक भी सम्मिलित हुए।कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के छायाचित्र पर धूप-दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया तत्पश्चात जन्मजय नायक दूवारा सरस्वती वंदना की सुमधुर प्रस्तुति दी गई।पश्चात कार्यक्रम में पधारे समस्त साहित्यकारों ने स्वपरिचय दिया।इस अवसर पर जन्मजय नायक ने अपने साहित्यक संबोधन में हिन्दी की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा-जिस भाषा के सहारे हमारी राष्ट्रीयता परवान चढ़ रही थी,जिसके माध्यम से सूर,तुलसी,कबीर, विद्यापति,मीरा से लेकर तिलक,गाँधी बोस तक ने पूरे राष्ट्र को एकता के सूत्र में बाँध दिया था आज उसमें कौन -सी खोट आ गई कि हम उसे दूध में पड़ी मक्खी के समान निकालकर फेंकते चले आ रहे हैं।हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषा से अपने को काटते हुए अपनी संस्कृति,सभ्यता और आज तक की अपनी समस्त कमाई को नकारते चले जा रहे हैं।ऐसा क्यों हो रहा है?आज हमारी राष्ट्रीयता ही दाँव पर चढ़ा दी गई है।”आज कौरवों के दरबार में दुशासन हमारी अस्मिता की द्रौपदी का चीर हरण करता चला आ रहा है..हमारा भीम,अर्जुन हीं नहीं श्रीकृष्ण भी निरूपाय से हो गए हैं।यदि हम आज भी अपनी उस द्रौपदी की करूण पुकार को नहीं सुन पाए तो हमारे पौरूष को धिक्कार है।
नायक ने आगे कहा जब हिन्दी की बात होती है तो बरबस ही ध्यान आता है कि हमारी राजभाषा हिन्दी है।आजकल के परिवेश में जाने क्यों हमारी संस्कृति और सभ्यता की केन्द्र बिन्दु रूपी यह भाषा उपेक्षित है?भाषा की रक्षा का सवाल किसी भी देश के लिए अपनी भौगोलिक सीमाओं की रक्षा के सवाल से अधिक महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। नायक ने आगे कहा समस्त संस्कारों के साथ-साथ भाषिक संस्कार देने का कार्य भी माता ही करती है।वह बच्चे की प्रथम गुरू है।अधिकतर उसी के संसर्ग में बच्चा प्रचलित भाषा सीखता है।माँ के इस श्रम के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन हेतु ही मातृभाषा जैसा शब्द अस्तित्व में आया।किन्तु दुर्भाग्य आज माताएँ बच्चों को जो भाषिक संस्कार दे रही हैं न उनकी पीढ़ी-दर पीढ़ी चली आ रही मातृभाषा है न राजभाषा,वह है गुलामी की भाषा अर्थात अंग्रेजी।गौरतलब है कि हिन्दी फिल्मों,खेलों से सर्वाधिक धन और यश कमाने वाले कलाकार एवं खिलाड़ी तक सार्वजनिक स्थलों और साक्षात्कारों में अंग्रेजी बोलने में गर्व अनुभव करते हैं।”हिन्दी की रोटी खाते और अंग्रेजी के गुण गाते उनकी आत्मा उन्हें नहीं धिक्कारती!”नायक ने आगे कहा हमारे देश की राजनीति ने इसे सिर्फ वोट की भाषा बनाकर छोड़ दिया है।किसी भी राष्ट्र ने राजनीतिक स्वार्थ के लिए भाषा को ऐसा मोहरा नहीं बनाया,जैसा भारतीय नेता ‘हिन्दुस्तानी’ के निर्माण में हिन्दी को बनाए हुए हैं।अगाध शब्द संपदा सम्पन्न हिन्दी को विदेशी शब्दों की भीख क्यों माँगनी चाहिए? क्या हमारे राजनेताओं के पास हठधर्मिता को छोड़कर कोई तर्कसम्मत उत्तर है? हिन्दी भाषा की अस्मिता के लिए हमें नैतिक मूल्यों का अध्ययन करना होगा।कारण यह है कि “हिन्दी को सबसे खतरा हिन्दी वालों से ही है क्योंकि घर -घर में अंग्रेजी घुस गई है।” वस्तुतः हमें अपनी राजभाषा की अस्मिता बचाने हेतु भाषायी आन्दोलन के साथ पुरजोर प्रयास करना होगा।विश्व के सभी लोग भारत की सभ्यता और संस्कृति से आलोक प्राप्त कर रहे हैं और हम गुमराह हो रहे हैं।दिए तले अंधेरे का इससे बड़ा उदाहरण कुछ नहीं होगा।
























