महिलाएं जुगाड़ की मशीन से वर्मी कम्पोस्ट के लिए तैयार कर रहीं बोरियां

पाटन विकासखंड के ग्राम पंचायत पतोरा की महिलाएं बोरी बनाने का कार्य कर रही हैं जो मूलत: मशीन से होने वाला काम है। यदि आटोमैटिक वूवन सैक कटिंग एंड स्टिचिंग मशीन लगाई जाती तो इसकी लागत 15 लाख रुपए होती, लागत की तुलना में रिटर्न कम होने से रोजगार की संभावना क्षीण हो जाती। जिला पंचायत के सहयोग से एक लाख रुपए खचर् कर जुगाड़ से मशीन तैयार कराई गई है। महिलाएं इस मशीन से सफलतापूर्वक बोरियां तैयार कर रहीं है।जिले में बड़े पैमाने पर वर्मी कंपोस्ट का उत्पादन हो रहा है और इसमें और भी वृद्धि किए जाने की दिशा में निरंतर कार्य हो रहे हैं। पतोरा में जो सेटअप लगा है उससे हर घंटे लगभग सौ बोरे तैयार हो सकते हैं। इस तरह पाटन ब्लाक में ही मार्केट कैप्चर करने की बड़ी संभावनाएं इसमें है। जिले में तात्कालिक तौर पर 60 हजार बारदानों की दरकार है।ग्राम संगठन की सदस्य नंदा श्रीवास ने बताया कि हमें यह काम बहुत अच्छा लग रहा है। अभी हम लोग 6 महिलाएं यह कार्य कर रही हैं। प्रति बोरे के पीछे हमें दो रुपए का लाभ हो रहा है। यदि किसी दिन 600 बोरा बना लिया तो बारह सौ रुपए का लाभ हो गया। इस प्रकार हर महीने ग्राम संगठन को चालीस से पचास हजार रुपए लाभ की संभावना इस सेटअप से बनती है।पतोरा की ही तर्ज पर दुर्ग ब्लाक के ग्राम निकुम में भी बोरा बनाने के सेटअप का काम लगभग पूरा हो चुका है और शीघ्र ही यह आरंभ हो जाएगा। इसके बाद धमधा ब्लाक में भी सेटअप शुरू कराने की योजना है।
स्वावलंबन का सुंदर उदाहरण
पतोरा के इस सेटअप में उद्यमिता और ग्रामीण अर्थशास्त्र से जुड़ी कई खूबियां मौजूद हैं। महात्मा गांधी के सुराजी गांवों के सेटअप में उद्यम की परिभाषा ऐसी दी गई है जिसमें दूसरों पर निर्भरता न्यूनतम हो। अब गाँव में गौठान है। गोबर है वर्मी कंपोस्ट है और उसे भरने के लिए बोरा भी अपने ही मशीन का है किसी भी तरह से निर्भरता नहीं है। साथ ही कास्ट कटिंग का भी यह खूबसूरत नमूना है कि किस तरह से ऊर्वर मस्तिष्क से और चीजों को नए तरीके से करने की सोच बड़े बदलाव का कारक बनती हैं।
























