सरायपाली : 10 साल की मासूम दुर्गा अपनी मेहनत से गढ़ रही औजार

स्थानीय फारेस्ट ऑफिस के सामने मध्यप्रदेश के ग्राम बरेली जिला रायसेन के 3 परिवार कबाड़ी लोहे को आकार देकर छोटा टंगिया, बसला, कत्ता, पैसुल, कुदाली एवं अन्य कई प्रकार के लोहे के औजारों के अलावा उपयोगी सामान बनाकर सडक़ के किनारे पसरा लगाकर बेच रहे हैं। इन लोहार परिवारों के द्वारा 250 रूपये से लेकर 700 रुपए तक के कई प्रकार के लोहे के सामान बेचे जा रहे हैं।
मध्यप्रदेश के 3 परिवार वाले लगभग 25 लोगों का एक लोहार परिवार सरायपाली में आया हुआ है। नगर के फारेस्ट ऑफिस के पास सडक़ के किनारे वे स्वयं लोहे को आकर देकर उससे विभिन्न सामग्रियाँ बनाकर बेच रहे हैं। उन्होंने बताया कि विगत सप्ताह भर से अधिक दिन हो गए यहाँ वे पसरा लगाकर लोहे से बने विभिन्न प्रकार के सामानों की बिक्री कर रहे हैं। तीन पीढ़ी (पुरखौती धंधे) को जीवित रखने के लिए वे आज भी बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी कबाड़ी लोहे को खरीदकर उसे आकार देकर हँसिया, बसुला, कुल्हाड़ी, परसुल आदि कई प्रकार के दैनिक उपयोग के सामान प्रतिदिन बना रहे हैं।
एक 10 साल की लडक़ी दुर्गा लोहार जिसे पढ़ाई करने बहुत शौक लेकिन मजबूरी उसे लोहा पीटने को मजबूर कर रही है। बच्चे एवं लड़कियाँ भी इनके साथ कंधे से कंधा मिलाते हुए भारी-भरकम घन पीटते हुए देखे जा सकते हैं। गरम लोहे पर एक साथ तीन से चार लोग घन पीटते हैं, जिससे वह जल्द ही लोहा आकार ले लेता है. इस क्षेत्र में ऐसा नजारा आमतौर पर देखने को नहीं मिलता और न ही इस क्षेत्र के लोहार ऐसे पसरा लगाकर सामान बेचते हुए दिखाई देते हैं।
शुभेर सिंह लोहार ने आगे बताया कि लोहे के सामान बनाना उनका पुश्तैनी व्यवसाय है और लगभग 50 वर्षों से इस व्यवसाय को कर रहे हैं। मध्यप्रदेश में भी उनका स्वयं का घर नहीं है, वे झोपड़ी बनाकर ही रहते हैं। वर्ष में 4 माह मध्यप्रदेश में रहते हैं तथा प्रतिवर्ष 6 माह के लिए वे छत्तीसगढ़ में आते हैं और अलग-अलग शहरों में घूम-घूम कर व्यवसाय करते हैं। वे 20 वर्षों से लगातार सरायपाली आ रहे हैं। लेकिन शासन द्वारा आज तक कोई मदद नहीं की गई है। सामानों की बिक्री को देखते हुए उनका एक स्थान पर रूकना होता है। बिक्री में गिरावट आने पर वे पुन: अन्यत्र पलायन कर जाते हैं। वे 15 दिन से लेकर एक माह तक एक स्थान पर रूकते हैं, उन्होंने बताया कि आजकल मशीनों के आ जाने से उनका व्यवसाय काफी प्रभावित हुआ है।
























