जिले के महिलाओं ने कांच की बोतल और प्लास्टिक के कचरे से बनाए चबूतरे, इन पर बैठते हैं लोग

कांच की बोतल व प्लास्टिक जैसे वेस्ट मटेरियल का उपयोग कर ग्राम बालाछापर में चबूतरा बना दिया है। यह काम एलएलआरएम सेंटर में काम करने वाली महिलाओं द्वारा किया गया है। ऐसा करके इन महिलाओं ने कांच जैसे जोखिमपूर्ण कचरे को उपयोगी बना दिया है। चबूतरे ग्रामीणों के बैठने के काम आएंगे।
अभी ग्राम बालाछापार में चबूतरों का निर्माण हुआ है। पर अब जिले भर के गांव में इस तरह की नई पहल स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के तहत किया जाएगा। स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण के जिला सलाहकार राजेश जैन ने बताया कि ग्रामीण इलाकों में संचालित एसएलआरएम सेंटरों में प्रतिदिन काफी मात्रा में कचरे इकट्ठा हो रहे हैं। कचरे तीन तरह के होते हैं। पहला जैविक कचरा जिससे खाद बनाया जाता है। दूसरा अजैविक कचरा जिसे रिसायकल कर रियूज किया जा सकता है। तीसरा जोखिमपूर्ण कचरा है, जिसका निपटान मुश्किल है। कांच की बाेतलें जोखिम पूर्ण कचरे में आती हैं जिसे यहां-वहां फेंका जाए तो यह लोगों को जख्म पहुंचा सकता है।
मवेशियों के लिए भी यह खतरनाक है। कोरोनाकाल में ट्रांसपोर्ट की सुविधा कम होने के कारण कबाड़ की बिक्री नहीं हो पा रही थी। अजैविक कचरा जैसे फाइवर, प्लास्टिक, लोहे, कागज, आदि बिक भी जा रहे थे पर कांच को कबाड़ में बेचना मुश्किल हो रहा था। बालाछापर में काफी अधिक संख्या में कांच की खाली बोतलें इकट्ठा हो गई थीं। ऐसी स्थिति को देखते हुए जिला पंचायत सीईओ केएस मंडावी के निर्देश पर इस कचरे को रियूज करने की प्लानिंग बनी। महिलाओं को कांच की खाली बोतलों से चबूतरा बनाने की विधि बताई गई। कुछ मजदूरों को लगवाकर गांव के छायादार पेड़ों के नीचे चबूतरे बना दिए गए हैं। ताकि ग्रामीण पेड़ की छांव में शांति से बैठकर वक्त बिता सकें।
129 ग्राम पंचायतों में बनाए जा रहे एसएलआरएम सेंटर
वर्ष 2021-22 में 129 ग्राम पंचायतों में सेरिगेशन सेड बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इसी वर्ष सभी जगहों पर एसएलआरएम सेंटरों का संचालन शुरू कर दिया जाएगा। नए 129 सेरिगेशन सेड तैयार हाे जाने के बाद जिले भर में 217 ग्राम पंचायतें ऐसी होंगी जहां डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन कर उस कचरे से ठोस व तरल अपशिष्ट को अलग करने का काम किया जाएगा। सूखे कचरे की बिक्री होगी व तरल अपशिष्ट का उपयोग खाद बनाने के लिए उपयोग में लाया जाएगा। हर एक सेंटरों में 10 से 12 महिलाओं का समूह काम करेगा। फिलहाल जिले में भर के 88 ग्राम पंचायतों में डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन का काम चल रहा है। जिन सेंटरों में कचरा की कबाड़ में बिक्री नहीं हो पा रही है वहां ऐसे नए प्रयोग किए जाएंगे। ताकि कचरे से महिलाओं भी महिलाओं को आमदनी हो। वैसे कचरा कलेक्शन से सर्विस चार्ज के रूप में महिलाएं आमदनी कर रही हैं।
सिंगल यूज प्लास्टिक से भी बन रहे कई सामान
ग्रामीण इलाकों के एसएलआरएम सेंटरों से कबाड़ बिक्री में हो रही समस्या को देखते हुए कई तरह के नए प्रयोग किए जा रहे हैं। कई सेंटरों में महिलाएं सिंगल यूज प्लास्टिक से गुलदस्ते बना रही हैं। गुलदस्तों की बिक्री आसानी से हो जाती है। कचरे मेें आए प्लास्टिक व जूट की बोरी, पुरानी कपड़े या अन्य चीजों से भी सामान बनाए जा रहे हैं।
पंचायत को भी लाभ
कचरों से हो रहे निर्माण में पंचायत को भी लाभ पहुंचेगा। सामान्य तौर पर पंचायतों में चबूतरा निर्माण के नाम पर 1 से 4 लाख रुपए तक खर्च किए जाते थे। पर अब यदि कचरों से ऐसे चबूतरे बनेंगे तो इस राशि का उपयोग दूसरे कार्यों में किया जा सकेगा। जिससे पंचायतों को लाभी मिलेगा।






















