पूर्व मुख्यमंत्री जोगी की किताब लगभग तैयार,राजनीतिक गलियारों में आ सकता है भूचाल

रायपुर।(काकाखबरीलाल)।1 नवम्बर 2000 यह वह दिन था जब छत्तीसगढ़ को नए राज्य का दर्जा मिला। नए राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत प्रमोद कुमार जोगी बने । एक आईएएस अफसर से राजनीति में पदार्पण और फिर बुलंदियों पर पहुंचने वाले जोगी, सड़क हादसे में बुरी तरह से जख्मी हो गए। कमर के नीचे के हिस्से ने काम करना बंद कर दिया। बावजूद इसके उनका राजनीतिक सफर जारी रहा। कई विवाद भी उनके नाम के साथ जुड़े। कोरोना वायरस के चलते लॉकडाउन का दौर में जोगी ने तय किया था कि उन्हें आत्मकथा लिखनी चाहिए।
20 मार्च से उन्होंने आत्मकथा लिखनी शुरू की, जो लिखते-लिखते 468 पन्नों तक जा पहुंची। जोगी खुद ही उसकी प्रूफ रीडिंग कर रहे थे कि उन्हें हार्ट अटैक आ गया। वे लम्बे से राजधानी के निजी अस्पताल भर्ती थे।
जोगी की आत्मकथा लिखने में उनके निज सहायक पाटले व कम्प्यूटर ऑपरेटर हर्षवर्धन पाल ने मदद की। जोगी इनके साथ सुबह तीन घंटे और शाम को तीन घंटे बैठते, वे बोलते जाते और ये लिखते जाते। पाटले उनके साथ 2000 से 2003 तक थे, और फिर 2008 से अभी तक। वे कहते हैं कि ‘मैंने कभी उन्हें थकते नहीं देखा था। उम्र के साथ थोड़ी कमी आई हो, मगर उनके तेवर अफसर वाले ही थे।
कई रहस्यों से पर्दा उठा सकती है यह आत्मकथा
अजीत जोगी नौकरशाह के तौर पर। अजीत जोगी राजनेता के तौर पर। अजीत जोगी पति, पिता के तौर पर। बताया जा रहा है कि इस आत्मकथा में सबकुछ होगा। उनके साथ जुड़े विवाद और घटनाएं को आत्मकथा बारीकी से प्रकाश डालेगी। संभव है कि इससे कई रहस्यों से पर्दा उठे, विवाद पैदा हो या हो सकता है कि इस आत्मकथा से वे तमाम जवाब मिलें, जो अब तक सवाल ही हैं।
इसके पूर्व लिखी गई थी किताबें
जोगी ने बतौर कलेक्टर रहते हुए अपने अनुभव को किताब की शक्ल दी। उन्होंने द रोल ऑफ डिस्ट्रिक कलेक्टर’ और एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ पेरीफेरल एरियाज’ नाम की दो किताबें लिखीं। बतां दें कि जोगी अविभाजित मध्यप्रदेश में कलेक्टर भी रहे।
जोगी की हालत बेहद नाजुक थी कॉर्डियक अरेस्ट के बाद कोमा में चले गए थे,बरहाल 29 मई 2020 को अजीत जोगी का निधन हो गया है, अब लॉक डाउन में अजीत जोगी ने बोलकर लिखवाई 468 पन्नों की आत्मकथा, बस फाइनल ही होने वाली थी, बचपन से लेकर आईपीएस-आईएएस अफसर बनने, फिर राजनेता और छत्तीसगढ़ के सीएम बनने तक का सफर सबकुछ है। आत्मकथा में सिर्फ नहीं हैं तो टाइटल(शीर्षक) वह तय होना बाकी था.। उनके चाहने वालों की चाह थी कि जोगी आत्मकथा को टाइटल दें और खुद लांच करें।लेकिन यह चाह अधूरी रह गई, अब उस पल का इंतजार है कि लोगों और उनको चाहने वालों को उनकी आत्मकथा कब पढ़ने और जानने मिलेगी।।

























