छत्तीसगढ़

प्रदेश विज्ञान सभा द्वारा विज्ञान विषय पर किताब लेखन का जगदीशपुर में हुआ शुभारंभ

पुस्तक लेखन के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को आधार बना कर लिखना जरूरी है। स्वास्थ्य से लेकर खगोल विज्ञान तक और सांपों से लेकर कृषि कानून तक किताबें लिखने के लिए रुपरेखा बनाई गई। छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा के कार्यकारी अध्यक्ष विश्वास मेश्राम ने कार्यशाला प्रारंभ करते हुए बताया गया कि इस कार्यशाला के द्वारा हम विज्ञान विषयों पर छोटी-छोटी पुस्तकें लिखने का कार्य प्रारंभ कर रहे हैं । ये पुस्तकें आम लोगों के बीच विज्ञान की प्रमाणिक जानकारियां पहुंचाएगी, पुस्तकों को रोचक शैली में लिखा जाएगा ताकि आम लोग विज्ञान के कठिन विषयों को भी सरलता से पढ़ और समझ सके । उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के साथ पुरानी पीढ़ी के अनुभवों को साझा करना जरूरी है। उन्होंने जोर दिया कि हमारी वर्तमान समस्याओं को गहराई से समझकर उनके कारणों को जानना है और उनके संभावित समाधानों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए खोजने का कार्य करना है । उन्होंने कार्यशाला में उपस्थित पूरे राज्य भर से आए विज्ञान कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि वे अपनी पसंद के विषयों को चुनकर उन पर छोटी छोटी पुस्तकें लिखना शुरू करें । यह सृजन का कार्य बहुत आनंद देने वाला है और हम रहे या ना रहे यह पुस्तकें हमारी बात को, हमारे विचारों, हमारी सोच और हमारे दृष्टिकोण के बारे में लोगों कोअवगत कराती रहेगी । उन्होंने कहा कि हमारी चिंताओं और उनके समाधान के लिए हमारे प्रयासों को भी याद रखा जाएगा। इस कार्यशाला को संबोधित करते हुए छत्तीसगढ़ विज्ञान सभा के उपाध्यक्ष हेमंत खुंटे द्वारा बताया गया कि पूर्व में भी विज्ञान सभा द्वारा वैज्ञानिक विषयों पर गीत नाटक और लेख लिखे जाने के लिए कार्यशालाएं आयोजित की जाती रही है । इसी कड़ी में जगदीशपुर जैसे अंचल में यह महत्वपूर्ण पुस्तक लेखन कार्यशाला आयोजित की जा रही है। वरिष्ठ साहित्यकार रामकुमार वर्मा ने इस आयोजन की प्रशंसा करते हुए इसे बहुत महत्वपूर्ण बताया और इस कार्यशाला के माध्यम से छत्तीसगढ़ के लोकोक्तियां और मुहावरों पर अपने पांडुलिपि तैयार करने की जानकारी दी। उदघाटन सत्र में राजिम से भाग ले रही चिकित्सक तथा शिशु रोग शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टर स्नेह लता हुमने ने जन विज्ञान केंद्र में आयोजित किए जा रहे इस कार्यशाला स्थल की भूरी भूरी प्रशंसा की । उन्होंने कहा कि प्रकृति की गोद में बसे इस रमणीय स्थान पर बहुत अच्छी किताबें लिखी जा सकती हैं। हम सबका किताब लेखन का यह प्रयास आम लोगों के लिए बहुत उपयोगी साबित होगा। कार्यशाला के प्रथम सत्र में अच्छी पुस्तके कैसे लिखी जाए इस पर चर्चा हुई तथा विज्ञान के विभिन्न विषयों पर किताब लेखन के लिए शीर्षकों का चयन किया गया । कार्यशाला के द्वितीय सत्र में दुर्ग से आए वनस्पति विज्ञानी और पूर्व अपर प्रमुख मुख्य वन संरक्षक (एपीसीसीएफ) डॉक्टर बीपी नोन्हारे द्वारा साल वनों के बारे में – जिस पर उन्होंने पुस्तक लेखन प्रारंभ किया है – विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि लाखों साल पहले साल वन, मुख्य रूप से आसाम से पूरे भारत में फैले हैं । इनकी एक शाखा उत्तर पश्चिम की ओर होते हुए नेपाल की तराई से होते हुए पाकिस्तान तक पहुंची जबकि दूसरी शाखा दक्षिण की ओर बंगाल झारखंड बिहार और उड़ीसा होते हुए बस्तर के पठार तक आई है। इसके नीचे दक्षिण में साल वनों का फैलाव नहीं मिलता । उन्होंने बहुत विस्तार से साल वनो की मिट्टी की गहराई, नमी की उपलब्धता तथा उर्वरता और बीज के अंकुरण के समयावधि आदि पर प्रकाश डाला।
उन्होंने चिंता जाहिर की कि जलवायु परिवर्तन, मिट्टी के क्षरण तथा मनुष्यों के दबाव के बढ़ते जाने के कारण साल वनों का रकबा तेजी से कम होते जा है जिसे बचाने के लिए सरकार को विशेष रूप से योजना बनाकर काम करने की जरूरत है। इसी सत्र में छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों तथा मुहावरों पर तैयार की गई पांडुलिपि के अंशों को प्रस्तुत करते हुए साहित्यकार तथा संस्कृतिकर्मी रामकुमार वर्मा ने अनेक छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियों तथा मुहावरों के अर्थ बतायें तथा उनकी उत्पत्ति की कहानियों के बारे में भी रोशनी डाली। ज्ञात हो कि रामकुमार वर्मा द्वारा इन लोकोक्तियों की खोज में पूरे छत्तीसगढ़ तथा मध्यप्रदेश के आदिवासी अंचलों का भ्रमण किया जाकर इन्हें संकलित किया गया है। उन्होंने छत्तीसगढ़ी हानों, मुहावरों, लोकोक्तियों और कहावतों को हमारी बोलचाल से लुप्त होते जाने को छत्तीसगढ़ी भाषा के लिए चिंताजनक संकेत बताया। उन्होंने छत्तीसगढ़ी भाषा में विज्ञान सभा द्वारा विज्ञान विषयों पर तैयार की जा रही पुस्तकों के लिए सराहना की।

कार्यशाला के तीसरे और चौथे सत्र में किताबें लिखने का अभ्यास किया गया। रात को अजय भोई, दिनेश कुमार और वेदव्रत उपाध्याय द्वारा विज्ञान सभा के 150 मिलीमीटर व्यास के न्यूटोनियन टेलिस्कोप से स्काईवाचिंग की व्यवस्था की गई। इस कार्यशाला में कोरबा से निधि सिंह, दिनेश कुमार, सुमित सिंह और वेदव्रत उपाध्याय, दुर्ग से डा बी पी नोन्हारे, भिलाई से रामकुमार वर्मा तथा विश्वास मेश्राम, राजिम से डा स्नेहलता हुमने, रायपुर से अंजू मेश्राम, पिथौरा से हेमंत खूटे, बिलासपुर से डा विवेक दुबे तथा डा सीमा, बसना से अजय भोई एवं देवेन्द्र कुर्रे तथा जगदीशपुर से डा वाय के सोना और मनोज नायक ने भागीदारी की।

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काका खबरीलाल

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