ज्योतिषशास्त्र – वेदों का अंग: आचार्य आशीष गौरचरण मिश्र

?ज्योतिषशास्त्र – वेदों का अंग !?
✍?आचार्य आशीष गौरचरण मिश्र
आकाशस्थ ज्योति से संबंधित शास्त्र है ‘ज्योतिषशास्त्र’
?समानार्थक शब्द
कालविधान शास्त्र
?महत्त्व
ज्योतिष एक वेदांग है । ‘ज्योतिषामयनं चक्षु’ अर्थात ज्योतिष वेदों का नेत्र है, ऐसा कहा जाता है ।
?व्युत्पत्ति एवं अर्थ
‘ज्योतिष’ शब्द ज्योति + ईश से बना है । ‘ज्योति’ का अर्थ ‘तेज’ तथा ‘ईश’ का अर्थ ‘ईश्वर’ अर्थात ‘ईश्वर के तेज से युक्त शास्त्र ज्योतिषशास्त्र है ।
ब्रह्माजी द्वारा निर्मित शास्त्र !
?श्रौतस्मार्त कर्म न सिद्धति ।
तस्माज्जगद्धिवतायेदं ब्रह्मणा रचितं पुरा ॥
– नारदसंहिता
अर्थ : ज्योतिष के बिना श्रौतस्मार्त कर्म सिद्ध नहीं होते; इसलिए कालज्ञान के रूप में विश्वकल्याण हेतु ब्रह्माजी ने प्राचीन काल में इस शास्त्र की उत्पत्ति की ।
?४ लाख श्लोकों का शास्त्र !
‘चतुर्लक्षं तु ज्यौतिषम् अर्थात ज्योतिषशास्त्र ४ लाख श्लोकों का शास्त्र है । इस शास्त्र का उपयोग अधिकांश श्रद्धशलु व्यक्ति अपने जीवन में करते हैं तथा उनमें से कई लोगों ने उसकी अनुभूति भी की है ।
?ज्योतिषशास्त्र का महत्त्व
आद्य मुनि नारदजी ने निम्न प्रकार से ज्योतिषशास्त्र का महत्त्व विशद किया है ।
?सिद्धान्तसंहिताहोरारूपत्रयात् मकम् ।
वेदस्य निर्मलं चक्षुर्ज्योति शास्त्रमनुत्तमम् ॥
अर्थ : ज्योतिषशास्त्र श्रेष्ठ है तथा वह वेदों का निर्मल नेत्र है । इस शास्त्र के सिद्धान्त, संहिता और होरा, ये तीन स्कंध हैं ।
?ज्योतिषशास्त्र को झूठ कहने का अर्थ वेदों को झूठ कहने जैसा है !
६ वेदांगों में से ज्योतिष एक अंग है । ऋग्वेद में ज्योतिषशास्त्र के ३६, यजुर्वेद में ४४, तो अथर्ववेद में १६२ श्लोक हैं । इससे ज्योतिषशास्त्र का वेदों के साथ कितना दृढ संबंध है, यह प्रमाणित होता है; इसलिए ज्योतिषशास्त्र को झूठ कहने का अर्थ ‘वेद झूठे हैं’, ऐसा कहने जैसा है । साथ ही कानून के आधारपर ज्योतिषशास्त्रपर प्रतिबंध लगा देने का अर्थ वेदोंपर प्रतिबंध लगाने जैसा है । लोकतंत्र द्वारा प्रदान की गई धार्मिक स्वतंत्रता के कारण कोई भी सरकार हिन्दुओं के धर्मग्रंथों के विरुद्ध कानून नहीं बना सकती; इसलिए ज्योतिषशास्त्र को अस्वीकार करने का अर्थ हिन्दुओं की धार्मिक स्वतंत्रता को अस्वीकार करने जैसा है । अतः ‘ज्योतिषशास्त्र का विरोध करना हिन्दू धर्म का विरोध करना है !’, ऐसा ही कहना पडेगा ।
*(संग्रहित लेखन)*
?बिना अध्ययन के ही ‘ज्योतिष झूठा है’ कहना विज्ञान के नियम में भी नहीं बैठता !
विज्ञान ने ज्योतिष के विषय में कुछ किया ही नहीं, तो उन्हें इस विषय में क्यों ओढें ? वैज्ञानिकों को कहने दीजिए ना कि यह हमारा विषय है । उन्हें ज्योतिष का अध्ययन करना हो, तो वे अवश्य करें । क्या वास्तुशास्त्र विषय वास्तुविशारद (आर्किटेक्ट) का है ? वे इस विषय का शास्त्र के रूप में अध्ययन करें और उसके पश्चात ही निष्कर्ष बताएं । बिना अध्ययन के ही ज्योतिष झूठा होने की बात करना विज्ञान के नियमों में भी नहीं बैठता !
?ग्रहों का प्रभाव दर्शानेवाला शास्त्र
‘ज्योतिषशास्त्र धर्म और अध्यात्म का एक स्तंभ है; किंतु आज कुछ तथाकथित धर्मशास्त्री ही ज्योतिषशास्त्र को अंधविश्वास प्रमाणित कर रहे हैं । शास्त्र ज्ञान और विज्ञान से भी श्रेष्ठ है । वेदों में कहा गया है, ‘अन्य शास्त्रों के लिए विरोध हो सकता है; किंतु चिकित्साशास्त्र, मंत्रशास्त्र और ज्योतिषशास्त्र ये सभी शास्त्र कदम-कदमपर विश्वास करनेयोग्य शास्त्र हैं । ‘यत ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे ।’, इसका अर्थ जो ब्रह्मांड में है, वही पिंड में अर्थात मनुष्य में है । केवल मनुष्यपर ही नहीं, अपितु प्रकृतिपर भी ग्रहों का स्पष्टरूप से प्रभाव दिखाई देता है, उदा. भूकंप आते हैं, चंद्रमा के कल के कारण ही समुद्र में ज्वार-भाटा आते हैं । ग्रहों के द्वारा ही ब्रह्मांड की ऊर्जा सकारात्मक अथवा नकारात्मक प्रकार से उत्सर्जित होती है । मनुष्य का मन और मस्तिष्कपर इसका प्रभाव पडता है और यही ऊर्जा सफलता और निष्फलता का कारण बनती है । ज्योतिषशास्त्र इसी ग्रहों के प्रभाव को दर्शाता है ।
?मनुष्य के अज्ञान के कारण यदि वह शास्त्र को प्रमाणित नहीं कर सका, तो चूक शास्त्र की नहीं है !
ज्योतिषशास्त्र हमारे धर्मरक्षा के कार्य में किसी संजीवनी की भांति कार्य करता है; क्योंकि जन्म से लेकर मृत्युतक के सभी कार्य ज्योतिषशास्त्र की कार्यकक्षा में आते हैं । आधुनिक युग में जहां भौतिकता की पराकाष्ठा हो रही है, उसके अनुसार विश्व के मापदंड भी बदल रहे हैं । सत्य स्थापित होने में कुछ समय अवश्य लगता है; किंतु लोगों में किसी विद्या अथवा शास्त्र को समझ लेने का संयम नहीं होता । ज्योतिषशास्त्र ग्रहों की गतिपर आधारित है और गति कर्म का प्रतीक है । तो कर्म के श्रेष्ठ माननेवाला विज्ञान अंधश्रद्धा का प्रतीक कैसे हो सकता है । किसी मनुष्य को उससे १ कि.मी. दूर की वस्तु दिखाई नहीं देती; इसलिए क्या उसका अस्तित्व ही नहीं है ? मनुष्य में ज्ञान अल्प है; इसलिए इस शास्त्र की प्रामाणिकता को चुनौती नहीं दी जा सकती । हिन्दू धर्म के किसी भी शास्त्र के प्रति का अज्ञान उस शास्त्र के महत्त्व को न्यून नहीं कर नहीं सकता !























