छत्तीसगढ़

जज्बे को सलाम पैरो से लिखकर पढ़ाई की पूरी, पाई आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की नौकरी

कहते उड़ान पंखों से नहीं हौसलों से होती है। पंख तो मुर्गे का भी होता है लेकिन हौसले तो बाज में ही होती है जो आसमान की ऊंचाइयों को रोज नापता है। इस उक्ति को चरितार्थ करने वाली रायगढ़ की एक युवती है जिसके हाथ न होते हुए भी आज न सिर्फ वह आंगनबाड़ी सहायिका है बल्कि वह आंगनबाड़ी पर्यवेक्षक की परीक्षा भी दे रही है।रायगढ़ जिले के ग्राम तिलगी की रहने वाली बहारतीन चौहान जिस आंगनबाड़ी में पैर से लिखना सीखी वहां आज आंगनबाड़ी सहायिका है और वह पर्यवेक्षक बनने की परीक्षा भी दे रही है। दरअसल बेहरतीन जन्म से विकलांग है और उसके दोनों हाथ नहीं है। वह अपने दिनचर्या की सारी चीजें अपने पैर से ही करती है। इस युवती ने अपनी शारीरिक अक्षमता को अपने जीवन पर हावी नहीं होने दिया और खुद के मेहनत से इस मुकाम पर है।रविवार को जब महिला बाल विकास विभाग के लिए व्यापम द्वारा परीक्षा का आयोजन किया गया था तो बहारतीन चौहान नटवर स्कूल में परीक्षा देंव आयी थी, उसने पैरों से उत्तर लिखकर परीक्षा दी। परीक्षा में सफल होना या न होना ये तो बाद का विषय है लेकिन शारिरिक अक्षमता के बावजूद भी ऐसा जज्बा दूसरे विकलांगों के लिए प्रेरणादायक है।बहारतीन चौहान रायगढ़ जिले के तिलगी गांव की रहने वाली है। उसके दोनों हाथ बचपन से ही नहीं हैं। उसके माता पिता मजदूरी करते थे । काम पर जाते वक्त उसके माता-पिता उसे गांव के ही आंगनबाड़ी केंद्र में छोड़ जाते थे, वहां इसने दूसरे बच्चों को हाथों से लिखते देखा। फिर उसने अपने पैर से लिखने का अभ्यास किया। धीरे-धीरे वह पैर से लिखने में पारंगत हो गई।

उसने पैर से ही कई परीक्षा पास कर पोस्ट ग्रेजुएशन तक पढ़ाई की और एक दिन उसी आंगनबाड़ी केंद्र में सहायिका के पद पर चयनित हुई जहां से उसने पैर में कलम फंसाकर लिखना सीखा था। जब उसे पर्यवेक्षक भर्ती की जानकारी मिली तो उसने उसकी परीक्षा भी देने की ठानी। अब परिणाम कुछ भी हो लेकिन उसका जज्बा ही सुकून देने वाला है।आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की नौकरी पाने के बाद उसके हौसले और बुलंद हुए। वह अभी और आगे बढऩे की चाह रखती है। इसके लिए बीते दिनों महिला एवं बाल विकास विभाग में हॉस्टल अधीक्षक के लिए व्यापम ने परीक्षा हुई तो इस परीक्षा में भी वह शामिल हुई। परीक्षा के प्रश्न पत्र उसने पैरों से हल किया।

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काका खबरीलाल

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