कोरबा

रेन वाटर हार्वेस्टिंग से जल के संकट को किया जा सकता है दूर : ‘छानी के पानी घर म‘ विषय पर हुआ कार्यशाला का आयोजन

काकाखबरीलाल,कोरबा 14 जून 2019

प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा प्रदेश में जल संरक्षण को लेकर चलाये जा रहे अभियान की दिशा में कलेक्टर श्रीमती किरण कौशल के मार्गदर्शन में छानी के पानी घर म विषय में एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन गुरूवार को ट्रांसपोर्टनगर आडिटोरियम में किया गया। कार्यशाला में गिरते भूजल स्तर, जल संकट को देखते हुए जल संरक्षण की दिशा में रेन वाटर हार्वेस्टिंग संरचना को अपनाने पर बल दिया गया। रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम कैसे और किन-किन तकनीक पहलुओं को ध्यान रखकर अपनाया जा सकता है इस संबंध में भी विस्तार से जानकारी वरिष्ठ भूजलविद श्री के. पाणीग्राही ने दी।
कार्यशाला में उन्होंने बताया कि समय के साथ पानी का स्तर नीचे जा रहा है। मार्च एवं जून महीने में पानी का स्तर इतना अधिक नीचे चला जाता है कि जल संकट की स्थिति निर्मित हो जाती है। कई स्थानों पर हैंडपंप, कुएं, तालाब आदि पानी के स्त्रोत सूख जाते हैं। जनसंख्या में वृद्धि से पानी की खपत, वृक्षों की कटाई, कांक्रीटीकरण, औद्योगिकीकरण तथा पानी की बर्बादी से जल संकट का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि पानी की समस्या एक बड़ी समस्या है, हमें इस समस्या से निपटने अभी से ठोस तैयारी शुरू कर देनी चाहिए नहीं तो न सिर्फ हम बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ी भी पानी के लिए तरसेगी। उन्होंने बताया कि ढाई प्रतिशत पानी की उपलब्धता पृथ्वी में है जिसमें से पाइंट तीन प्रतिशत पानी धरती में मानव, प्राणी तथा अन्य के लिए है। बहुत कम पानी के बीच हम जल संरक्षण की दिशा में कठोर कदम नहीं उठाते हैं। कार्यशाला के माध्यम से उन्होंने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के आधार पर प्रति व्यक्ति एक दिन में 135 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। जिसमें पीने एवं दैनिक आवश्यकताओं के लिए पानी का उपयोग होता है। उन्होंने रेनवाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम घरों, भवनों में लगाने के लिए आवश्यक तकनीकी पहलुओं को उदाहरणों के माध्यम से बताया। श्री पाणीग्राही ने बताया कि सरफेस वाटर एवं छत के पानी को पाइप के माध्यम से किस प्रकार से इकट्ठा कर इसका उपयोग घरों में पीने के अतिरिक्त पौधों के लिए, दैनिक उपयोगों के लिए कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि वर्षा के पानी को पीने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए एक दो बार के बारिश के पानी को छोड़कर, छतों की सफाई कराकर तथा संरक्षित पानी को फिल्टर कर उपयोग किया जा सकता है।
कार्यशाला में जिला पंचायत सीईओ श्री इंद्रजीत सिंह चंद्रवाल ने जल का महत्व को बताते हुए इसके संरक्षण की आवश्यकताओं को बताया। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण की दिशा में कदम उठाने से पूर्व जागरूक होकर जल संकट को समझने की आवश्यकता है। हम लोग अभी जल संरक्षण को इसलिए महत्व नहीं देते क्योंकि हम सोचते हैं कि पानी तो हमारे पास पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। इस तरह की धारणा को अब त्याग कर हमें जल बचाने की दिशा में काम करना होगा। इसके लिए हम वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का इस्तेमाल अपने घरों में अवश्य करें। अपर आयुक्त नगर निगम अशोक शर्मा ने भी जल के महत्व को बताते हुए इसके संरक्षण की दिशा में कदम उठाने की अपील की।
महापौर श्रीमती रेणु अग्रवाल ने दिलाई शपथ- छानी के पानी घर म विषय पर कार्यशाला का शुभारंभ महापौर श्रीमती रेणु अग्रवाल ने दीप जलाकर किया। उन्होंने उपस्थित लोगों को शपथ दिलाई कि- हम सब निष्ठापूर्वक यह शपथ लेते हैं कि हम आज से जल दुरूपयोग नहीं करेंगे, जल का दुरूपयोग न हो इसके लिए हम अपने परिवार इष्ट मित्रों एवं अपने पास के लोगों को जल संरक्षण के लिए प्रेरित करेंगे। हम यह भी शपथ लेते हैं कि वर्षा जल को संरक्षित करने हेतु अपने घरन में वर्षा जल संरक्षण प्रणाली लगायेंगे। इस दौरान श्रीमती कुसुम द्विवेदी, एमआई सदस्य रामगोपाल यादव, पीएचई के ईई समीर गौर, सीएमएचओ डा. बी.बी.बोर्डे आदि उपस्थित थे।
वर्षा जल संरक्षण को विभिन्न उपाय- कार्यशाला में बताया गया कि जल संकट देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व की एक गम्भीर समस्या है। वर्षा जल संरक्षण को विभिन्न उपायों के माध्यम से प्रोत्साहन देकर ही गिरते भू-जल स्तर को रोका जा सकता है। यही एक श्रेष्ठ एवं सफल विकल्प है। इस जल प्रबन्धन के द्वारा शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जा सकता है। इसकी कई विधियां हैं –
सीधे जमीन के अन्दर – इस विधि के अन्तर्गत वर्षा जल को एक गड्ढे के माध्यम से सीधे भू-जल भण्डार में उतार दिया जाता है।.
खाई बनाकर रिचार्जिंग- इस विधि से बड़े-बड़े संस्थानों के परिसरों में बाउन्ड्री वाल के साथ-साथ बड़ी-बड़ी नालियाँ (रिचार्ज ट्रेंच) बनाकर पानी को जमीन के भीतर उतारा जाता है। यह जल जमीन में नीचे चला जाता है और भू-जल स्तर में सन्तुलन बनाए रखने में मदद करता है।
कुओं में वर्षा जल को उतारना-वर्षा जल को मकानों के ऊपर की छतों से पाइप के द्वारा घर के या पास के किसी कुएँ में उतारा जाता है। इस विधि से न केवल कुऑं रिचार्ज होता है, बल्कि कुएँ से पानी जमीन के भीतर भी चला जाता है। यह जल जमीन के अन्दर के भू-जल स्तर को ऊपर उठाता है।
ट्यूबवेल में वर्षा जल को उतारना- भवनों की छत पर बरसात के जल को संचित करके एक पाइप के माध्यम से सीधे ट्यूबवेल में उतारा जाता है। इसमें छत से ट्यूबवेल को जोड़ने वाले पाइप के बीच फिल्टर लगाना आवश्यक हो जाता है।
वर्षा जल को टैंक में जमा करना – भू-जल भण्डार को रिचार्ज करने के अलावा वर्षा जल को टैंक में जमा करके अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा किया जा सकता है। एक हजार वर्ग फुट की छत वाले छोटे मकानों के लिये उपरोक्त तरीके काफी उपयुक्त है। इन विधियों से बरसात के जल का लम्बे समय तक उपयोग किया जा सकता है। वर्षा काल में एक छोटी छत से लगभग एक लाख लीटर पानी जमीन के अन्दर उतारा जा सकता है। इसके लिये सबसे पहले जमीन में 3 से 5 फुट चौड़ा और 5 से 10 फुट गहरा गड्ढा बनाना होता है। छत से पानी एक पाइप के जरिए इस गड्ढे में उतारा जाता है। खुदाई के बाद इस गड्ढे में सबसे नीचे बड़े पत्थर (कंकड़), बीच में मध्यम आकार के पत्थर (रोड़ी) और सबसे ऊपर बारीक रेत या बजरी डाल दी जाती है। यह विधि जल को छानने (फिल्टर करने) की सबसे आसान विधि है। यह सिस्टम फिल्टर का काम करता है। इससे बरसात में बहकर बर्बाद हो जाने वालों पानी से वही जमीन में डालने से समीप के भूगर्भ जल स्तर को ऊंचा करता है।
वर्षा जल संरक्षण ही एकमात्र विकल्प- भू-जल के अंधाधुंध दोहन होने, उसके रिचार्ज न हो पाने से जमीन की नमी खत्म होती है और सूखापन आता है। भू-जल की कमी जमीन की सतह के तापमान बढ़ जाने का एक कारण भी बनता है।
ग्रामीण-शहरी, दोनों स्थानों में पानी का दोहन नियंत्रित होने तथा जल संरक्षण एवं भण्डारण की समुचित व्यवस्था होने पर भू-गर्भ जल संचित होता रहता है।

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