महासमुंद

महासमुंद जिले में नहीं हो रहा हाथियों की समस्या का समाधान

रिपोर्ट – नंदकिशोर अग्रवाल

काकाखबरीलाल/ पिथौरा । विदित हो कि पिछले 2 सालों से हाथियों के दल का आगमन महासमुंद जिले के सिरपुर क्षेत्र में हुआ था। उसके बाद हाथियों का झुंड बिखर कर समूचे महासमुंद जिले में विचरण करने लगा। वर्तमान में भी इन हाथियों का झुंड चार दलों में बंट कर अलग-अलग क्षेत्रों में विचरण कर रहा है हाथियों का दल जंगल में रहे तो अच्छी बात। लेकिन अब ग्रामीणों की जान के साथ साथ खेतों में खड़ी फसल को भी भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।
अभी हाल ही में पिथौरा के समीप ग्राम खैर खूंटा में धान की फसल को काटकर उसकी रखवाली कर रहे किसान को उठाकर पटक कर पैरों से कुचल कर मार डाला।
इससे पहले भी हाथियों ने महासमुंद जिले में कई मौतों को अंजाम दिया है इस पर भी वन अमले का मौन रहना और हाथियों के रिहायशी क्षेत्र में विचरण करने पर कोई समुचित प्लान ना बना पाना इन की नाकामी ही कही जाएगी। अब तो रात्रि में बाहर से आने वाले ग्रामीण भी अपने गांव की ओर रात में जाने से डरने लगे हैं।
उनका कहना है कि गाहे बगाहे रास्ते में हाथियों से सामने हो जाने पर उनकी जान को खतरा हो सकता है। जिससे समूचा क्षेत्र दहशतदा है शाम होते ही ग्रामीण अपने अपने घरों को दुबक जाते हैं खेतों में अपनी खड़ी फसल को भगवान भरोसे छोड़ कर क्योंकि ग्रामीणों का कहना है की जान है तो जहान है। वहीं जनहानि पर वन अमला मुआवजे की रकम देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं ।

नहीं हो रहा कुमकी हाथियों का उपयोग

करीब साल भर पहले कर्नाटक से मंगाए गए चार कुमकी हाथी जंगली हाथियों को वश में करने के लिए महासमुंद जिले में लाए गए थे। लेकिन साल भर में अधिकारियों के अनुसार इन को ट्रेनिंग दी जा रही है साल भर में भी इनकी शायद ट्रेनिंग पूरी नहीं हुई और ट्रेनिंग के ऊपर में लाखों रुपए खर्च कर हाथियों को यूं ही पाला जा रहा है ।इतना पैसा यदि जंगली हाथियों को वश में करने हेतु कोई प्लान बनाकर लगाया गया होता तो महासमुंद जिले में आज समस्या सुलझने की ओर होती ।कुमकी हाथियों के ऊपर में उनके पालन पोषण एवं रखरखाव पर हो रहे खर्च से हाथियों का पेट तो पल ही रहा है वहीं अधिकारी कर्मचारी भी मौज कर रहे हैं बहर हाल देखना यह है कि महासमुंद जिले में आक्रमक हो चुके इन जंगली हाथियों से ग्रामीणों की जान एवं खड़ी फसल की सुरक्षा इन जंगली हाथियों से कब हो पाएगी और हो पाएगी भी गी या नहीं। क्योंकि ग्रामीण अब सरकार और अधिकारी कर्मचारियों के आगे अपनी समस्याओं को लेकर नतमस्तक हो चुके हैं।

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