पिथौरा का गौरव पथ: विकास की प्रतीक्षा में उपेक्षा का दंश, ठेकेदार की लापरवाही बनी नगरवासियों के लिए अभिशाप

काकाखबरीलाल@पिथौरा। पिथौरा नगर में बहुप्रतीक्षित गौरव पथ निर्माण कार्य, जो कभी नगर के कायाकल्प और विकास की नई इबारत लिखने का सपना था, आज अपनी अधूरी अवस्था और ठेकेदार की सुस्त कार्यशैली के कारण नगरवासियों के लिए अभिशाप बनता जा रहा है। एक वर्ष से भी अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह परियोजना न केवल अधूरी पड़ी है, बल्कि इसके चलते आमजन को असुविधा, दुर्घटनाओं और प्रशासनिक उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है।
ठेकेदार की लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता
गौरव पथ निर्माण कार्य के दौरान ठेकेदार द्वारा कार्यकुशलता और अनुभव की घोर कमी उजागर हुई है। अधिकांश स्थानों पर नालियों का निर्माण अधूरा छोड़ दिया गया, जिससे बरसात के दिनों में गंदा पानी घरों में घुसने लगा है और नालियों की बजबजाहट से नगर का वातावरण दूषित हो रहा है। मुख्य चौक पर अधूरी सड़कें रोजाना दुर्घटनाओं का सबब बन रही हैं, राहगीर गिरकर घायल हो रहे हैं, और यह मार्ग नगरवासियों के लिए काल बनता जा रहा है।
योजना से जुड़े प्रशासनिक अधिकारियों और इंजीनियरों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है।
निर्माण कार्य की निगरानी के बावजूद, इंजीनियरों की अनदेखी और संभवतः किसी दबाव या भ्रष्टाचार के चलते, गुणवत्ता और समयसीमा दोनों की बलि चढ़ रही है। जनता यह सवाल करने को विवश है कि आखिरकार जिम्मेदार अधिकारी किस दबाव में हैं, जो उन्हें नगर की दुर्दशा नहीं दिखता
ठेकेदार और प्रशासन की लापरवाही से त्रस्त होकर नगर के युवाओं ने नागरिक चेतना का परिचय दिया। कुछ दिन पूर्व जब ठेकेदार द्वारा मार्ग बंद होने की सूचना के लिए संकेतक बोर्ड तक नहीं लगाए गए, तब युवाओं ने स्वयं “आगे रास्ता बंद है” का बोर्ड बनाकर लगाया, जिससे राहगीरों को परेशानी से निजात मिली थी। यह पहल न केवल प्रशासन की विफलता को उजागर करती है, बल्कि नागरिक जिम्मेदारी का भी उत्कृष्ट उदाहरण है।
विकास के वादे और जमीनी हकीकत
नगर पंचायत और शासन-प्रशासन ने गौरव पथ के माध्यम से पिथौरा के विकास का सपना दिखाया था—24 करोड़ की लागत, दोहरीकरण, डिवाइडर, आधुनिक ड्रेनेज, पाथवे, प्रकाश व्यवस्था, पार्किंग आदि की योजनाएं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि निर्माण की धीमी गति, अधूरी सड़कें, गंदगी, दुर्घटनाएं और नागरिकों की बढ़ती परेशानी ने विकास के इन दावों की पोल खोल दी है।
नगरवासियों के मन में सवाल है—क्या गौरव पथ कभी पूर्ण होगा? क्या ठेकेदार और इंजीनियर की जवाबदेही तय होगी? क्या प्रशासन नागरिक सुविधाओं और सुरक्षा के प्रति जागरूक होगा? जब तक इन प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता, तब तक गौरव पथ नगर के लिए गौरव नहीं, बल्कि पीड़ा का मार्ग बना रहेगा।
पिथौरा के गौरव पथ की अधूरी कहानी विकास के नाम पर उपेक्षा, लापरवाही और भ्रष्टाचार की गूंज है। नगरवासियों की पीड़ा, युवाओं की चेतना और प्रशासन की उदासीनता—ये सब मिलकर एक बड़ा सवाल खड़ा करते हैं: क्या हमारा तंत्र नागरिकों की बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा के प्रति वाकई संवेदनशील है? जब तक ठेकेदार, इंजीनियर और प्रशासन अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तब तक पिथौरा का गौरव पथ विकास की नहीं, उपेक्षा की मिसाल बना रहेगा।

























