छत्तीसगढ़

रविवि के शोधार्थी ढालसिंह ने खोजी जैन तीर्थंकर की मूर्ति

रविवि के शोधार्थी ढालसिंह देवांगन ने राजधानी से महज 26 किमी दूर मुर्रा गांव में सूर्य की मूर्ति, स्त्री स्तंभ और जैन तीर्थंकर की खोज की है। वे बताते हैं कि मेरी पीएचडी रायपुर की लाइफ लाइन खारून पर चल रही है। नदी के दोनों किनारे स्थित गांवों के पुरातत्व स्थल पर काम कर रहा हूं। इसी दौरान मुर्रा में यह मूर्तियां प्राप्त हुई। शुक्रवार को संस्कृति विभाग की ओर से ऑडिटोरियम में गढ़ों का गढ़ छत्तीसगढ़ विषय पर तीन दिनी संगोष्ठी की शुरुआत हुई। देवांगन ने बताया, संगोष्ठी में मेरा विषय था-खारून नदी तट पर नवअन्वेषित जल दुर्ग ग्राम मुर्रा की विशेषता। इसमें मैंने मुर्रा के पुरातात्विक स्थलों के बारे में बताया। किसी जमाने में मुर्रा एक टीला था। यहां एक तरफ मोट या परिखा बनाया गया था। यह एक तरह का गड्ढा होता है जिसमें पानी भरा होता है। उस दौर में यहां मगरमच्छ और सांप डाले जाते थे। ताकि दुश्मन की पहुंच टीले तक आसानी ने पहुुंच पाए। पहले दिन 3 एकेडमिक सत्र हुए जिसमें 19 शोध पत्र पढ़े गए। शनिवार को 4 एकेडमिक सत्रों में 40 रिसर्च पेपर प्रस्तुत किए जाएंगे। आखिरी दिन शोधार्थियों को विभाग की ओर से आरंग के पास रीवा में चल रहे उत्खनन का भ्रमण कराया जाएगा।

खैरागढ़ विवि के शोधार्थी मोहन कुमार साहू और आराधना चतुर्वेदी ने खैरागढ़ पर अपना शोध प्रस्तुत किया। इसमें उन्होंने बताया कि मराठा शासक रघुजी भोंसले ने खडगऱाय को बुलाकर पिपरिहा, मुश्का और आमनेर नदी के बीच एक गांव बसाया। उन्हें यहां की जिम्मेदारी सौंपी थी। इससे पहले खडगऱाय खोलवा में शासन कर रहे थे। इनके उत्तराधिकारी हुए टिकैत राय। एक बार जब टिकैत लांजी गए हुए थे तो भवानी सिंह ने हमला बोल दिया। तब टिकैत राय की रानी पुरुष वेष में युद्ध लड़ा था जो तीन दिन चला। जब भवानी को पता चला कि टिकैत लांजी से लौट रहे हैं तो वह अपने गांव धमधा भागा। टिकैत ने धमधा में हमला बोल कर भवानी को पराजित किया। खडग़ाराय की वजह से इस इलाके का नाम खैरागढ़ पड़ा। वैसे जनश्रुति के अनुसार यहां खैर के पेड़ ज्यादा थे इसलिए खैरागढ़ कहा जाने लगा।

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छत्तरसिंग पटेल

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