कविता – संग्रह ‘दिलवालों का देश कहाँ ‘ विमोचित देश की असली छवि वहाँ के साहित्य में देखिए -डॉ. चित्तरंजन कर

- कविताओं में मानवीय संवेदनाओं के साथ
हो सामाजिक सरोकार – गिरीश पंकज
नंदकिशोर अग्रवाल, काकाख़बरीलाल @ पिथौरा। 7 जनवरी 2026/श्रृंखला साहित्य मंच पिथौरा द्वारा कल 6जनवरी को छत्तीसगढ़ के तहसील मुख्यालय पिथौरा में आयोजित समारोह में प्रदेश के वरिष्ठ साहित्यकार और श्रृंखला मंच के वरिष्ठ सदस्य स्वराज्य करुण के कविता -संग्रह ‘दिलवालों का देश कहाँ ‘ का विमोचन किया गया.वरिष्ठ साहित्यकार,भाषा -विज्ञानी और छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा पंडित सुन्दरलाल शर्मा राज्य अलंकरण से सम्मानित डॉ. चित्तरंजन कर ने मुख्य अतिथि की आसंदी से इस पुस्तक का विमोचन किया. समारोह की अध्यक्षता छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार और उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान से साहित्य भूषण सम्मान प्राप्त कवि, पत्रकार और लेखक गिरीश पंकज ने की. विशेष अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार और छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जन -जाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष जी. आर. राना और पिथौरा निवासी सुप्रसिद्ध कहानीकार और उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक उपस्थित थे.
समारोह को सम्बोधित करते हुए मुख्य अतिथि डॉ. चित्तरंजन कर ने कहा कि किसी भी देश की असली छवि अगर देखनी हो, तो वहाँ के साहित्य में देखिए ह. उन्होंने कहा कि साहित्य रचना कोई शौक नहीं, कोई मौज नहीं, कोई चाय की चुस्की नहीं, बल्कि एक चेतना है, वेदना है, संवेदना है, जो रचनाकार को लिखने के लिए प्रेरित करती है. साहित्यकार समाज रुपी शरीर का मुख है. वह समाज के दर्द को महसूस करके उसे अपने शब्दों से अभिव्यक्ति देता है.उन्होंने कहा कि समय के साथ देश, दुनिया में और समाज में परिवर्तन तो ठीक है, लेकिन मानवीय मूल्यों का जो विघटन हो रहा है, वह चिन्ताजनक है.
डॉ. कर ने कहा कि साहित्य संस्कार है और भाषा संस्कृति है. साहित्य हमें अच्छे संस्कार देकर मनुष्य बनना सिखाता है. हजारों वर्ष पुरानी पंचतंत्र की कहानियाँ और जातक कथाएँ आज भी इसका उदाहरण हैं. डॉ. कर ने कविताओं के संदर्भ में कहा कहा कि दुनिया में जब तक गीत हैं, तब तक संवेदना है और जब तक संवेदना है, तब तक मनुष्यता है. उन्होंने कहा कि करुणा ही कविता रचती है.स्वराज्य करुण के कविता -संग्रह ‘दिलवालों का देश कहाँ ‘ में संकलित उनकी कविताओं में इसे महसूस किया जा सकता है.इन कविताओं की हर पंक्ति सारगर्भित है.संग्रह की हर कविता में देशज भावनाएँ हैं और मानवीय संवेदनाएँ हैं.इनमें वैचारिक रूप से उदात्त भावनाएँ हैं.
समारोह को सम्बोधित करते हुए अध्यक्षीय आसंदी से वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार गिरीश पंकज ने कहा कि कहा कि आज के दौर में लिखी जा रही कई कविताओं में कलात्मकता तो होती है, लेकिन उनमें भाषा की धार नहीं होती, सिर्फ़ शब्दों की जादूगरी होती है,जबकि उनमें मानवीय संवेदनाओं के साथ सामाजिक सरोकार भी होना चाहिए.
स्वराज्य करुण के रचना -कर्म से मैं किसी न किसी रूप में विगत लगभग चालीस वर्षों से परिचित हूँ वे लोक मंगल, सामाजिक -सरोकार और लोक जागरण के कवि हैं.उनकी कविताओं में समाज का दर्द दिखाई देता है. उनके कविता -संग्रह ‘दिलवालों का देश कहाँ ‘ का उल्लेख करते हुए गिरीश पंकज ने कहा -कवि चिंतित है कि धीरे -धीरे यह देश धन वालों का देश होता जा रहा है. इसलिए दिलवालों का देश हाशिए पर चला गया है. कवि स्वराज्य करुण उस देश को हाशिए से राष्ट्र के केन्द्र में लाना चाहते हैं.उनके संग्रह की कविताओं में रोमांस नहीं बल्कि समाज की पीड़ा की अभिव्यक्ति है. समाज में जो कुछ भी पीड़ादायक घटित हो रहा है, उसे यह कवि बेबाक तरीके से कहता है. कहीं कोई लुका छिपी नहीं. इसीलिए मुझे स्वराज्य करुण की काव्य -यात्रा शुरु से पसंद है.गिरीश पंकज ने कहा कि उनके इस संग्रह की कविताएँ हमें सोचने के लिए विवश करती हैं. इनमें गीत भी हैं और ग़ज़लें भी. सबसे अच्छी बात ये है कि ये सभी छंदबद्ध रचनाएँ हैं.
श्री पंकज ने पिथौरा के एक अच्छे और सकारात्मक साहित्यिक वातावरण का उल्लेख करते हुए इसके लिए श्रृंखला साहित्य मंच की तारीफ़ की. उन्होंने कहा कि यहाँ के कवियों में और साहित्य प्रेमियों में कोई बनावटीपन नहीं, बल्कि सहजता, सरलता और आत्मीयता है.इसलिए पिथौरा आना मुझे अच्छा लगता है.
विशेष अतिथि जी. आर. राना ने आज के समय में गाँवों की जीवन शैली में आ रहे निराशाजनक बदलाव पर चिन्ता प्रकट की. उन्होंने कहा कि बचपन में हम जिस बरगद की शाखाओं में खेलते और झूलते थे,, जो हमें शीतल छाया देती थीं, वे शाखाएँ ‘बॉब कट ‘तरह कटती जा रही हैं अब ना तो कहीं दाऊ का बाड़ा है और न ही बरगद और पीपल छाँव. इसी संदर्भ में उन्होंने अपनी एक लोकप्रिय छत्तीसगढ़ी कविता की भी पंक्तियाँ पढ़कर सुनाई -मोर गाँव गंवागे संगी, मय कहाँ रिपोर्ट लिखाँव?
जी. आर. राना ने कहा कि स्वराज्य करुण के कविता -संग्रह के शीर्षक ‘दिलवालों का देश कहाँ ‘ में हमारे खोए हुए गाँव की तरह खोए हुए देश के लिए चिन्ता झलकती है. आइए, हम सब मिलकर उस देश को खोजें.
विशेष अतिथि वरिष्ठ कहानीकार और उपन्यासकार शिवशंकर पटनायक ने भी कविता संग्रह की प्रशंसा की. महासमुन्द के कवि अशोक शर्मा ने संग्रह का उल्लेख करते हुए इस अवसर पर कहा कि साहित्यिक रचनाओं के शब्दों से समाज को ऊर्जा मिलती है. उन्होंने कहा कि साहित्य सदैव शाश्वत होता है.स्वागत भाषण श्रृंखला साहित्य मंच के अध्यक्ष प्रवीण प्रवाह ने दिया.समारोह का संचालन साहित्य मंच के पूर्व अध्यक्ष उमेश दीक्षित ने किया.इस अवसर पर श्रृंखला साहित्य मंच के सचिव संतोष गुप्ता, पूर्व अध्यक्ष अनूप दीक्षित,वरिष्ठ सदस्य शशि कुमार डड़सेना,एफ. ए. नंद, माधव तिवारी, डॉ. जीतेश्वरी साहू, गुरप्रीत कौर सहित महासमुन्द के बन्धु राजेश्वर खरे, बागबाहरा के रुपेश तिवारी, धनराज साहू और हबीब समर, कोमाखान के डॉ.विजय शर्मा और किसान दीवान बसना के बद्री प्रसाद पुरोहित, अभनपुर के ललित शर्मा, सांकरा (जोंक )के जवाहर लाल नायक, रायपुर की श्रीमती माधुरी कर, पिथौरा के सर्वश्री मधुसूदन महान्ति, रितेश महान्ति, आकाश महान्ति, मनोहर साहू,विवेक दीक्षित,गुरुचरण सिंह सलूजा,अनंत सिंह वर्मा, रमेश भोई, रमाशंकर पाण्डेय, श्रीमती सविता डे, श्रीमती सुप्रिया दास, नरेन्द्र जोशी,ग्राम खुटेरी के घनश्याम धांधी तथा बड़ी संख्या में आंचलिक साहित्यकार और साहित्य प्रेमी नागरिक उपस्थित थे.
समारोह के अंत में डॉ. चित्तरंजन कर ने स्वराज्य करुण के कविता संग्रह के कुछ गीतों के साथ प्रवीण प्रवाह की एक ग़ज़ल का भी अपनी आवाज़ में संगीतमय प्रस्तुतिकरण किया।























