सरायपाली: इन परिवारों के आय का प्रमुख साधन संबलपुरी साड़ी बनाना

सरायपाली( काकाखबरीलाल).प्रमुख रूप से उड़ीसा में बनने वाला संबलपुरी साड़ी पूरे देश में काफी प्रसिद्ध है। महासमुंद जिले से लगे उड़ीसा के कुछ जिलों में इसका उत्पादन प्रमुखता से होता है। लेकिन अब सरायपाली क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं रहा है। यहां भी कुछ स्थानों पर संबलपुरी साड़ी बनाए जा रहे हैं, जो कि कुछ परिवारों के आय का प्रमुख साधन बन गया है। सरायपाली क्षेत्र के ग्राम खैरझिटकी, बेलमुण्डी, झिलमिला, अमरकोट, कसडोल आदि गांवों के कुछ के घरों में पूरा परिवार मिलकर हाथ से बुनाई कर संबलपुरी साड़ी बनाने का काम करते हैं। संबलपुरी साड़ी एक पारंपरिक हाथ से बुनी हुई साड़ी होती है, जिसमें ताना और बाना बुनाई के साथ टाई-डाई होते हैं। इसका उत्पादन ओडिशा के बरगढ़, सोनपुर, संबलपुर, बलांगीर और बौध जिले में अधिक किया जाता है। इसके साथ-साथ सरायपाली विकासखण्ड के कुछ-कुछ गांवों में भी इसे बनाया जा रहा है। ग्राम खैरझिटकी के 20-25 परिवार ऐसे हैं, जो खेती किसानी के साथ-साथ संबलपुरी साड़ी बनाकर अपनी आजीविका चलाते हैं। खैरझिटकी निवासी अनिल मेहेर पिता पुरंदर मेहेर ने बताया कि 1 साड़ी बनाने पर उन्हें 4 से 5 हजार रूपए लागत के साथ मिलता है। महीने में लगभग 15 से 20 हजार रूपए की कमाई हो जाती है। खासकर उन्हें बरगढ़ से ज्यादा आर्डर मिलते हैं। पूरा परिवार मिलकर यह कार्य करते हुए अपना भरण पोषण करते हैं। हालांकि इस कार्य के साथ-साथ वे सीजन में खेती किसानी का भी काम करते हैं। यह व्यापार उड़ीसा के संबलपुर जिला का मुख्य व्यापार है और संबलपुर क्षेत्र की महिलाएं संबलपुरी साड़ी बडे़ ही शौक से पहनती हैं। यह कला न केवल जीविकोपार्जन का साधन है, बल्कि एक पूरे इलाके की अलग पहचान भी है। ये साड़ियां ओडिशा की शान कही जाती हैं। संबलपुरी साड़ी तैयार करना मेहेर समुदाय का पुश्तैनी कारोबार है। यहां गांव के तकरीबन 20 से 25 घरों में संबलपुरी साड़ी तैयार की जाती है। यहां इस कला को देखना भी मनोरंजन का साधन है।
इस तरह तैयार होती है संबलपुरी साड़ी इन साड़ियों को बुनने से पहले बाजार से तना लाते हैं, उसे चावल के पानी में भिगोकर अलग-अलग करते हैं। उसके बाद ग्राफ के अनुसार बांधते हैं फिर कलर करते हैं। कलर करने के बाद फनी में जोड़ते हैं फिर उसे लम्बा करके आगे लेना पड़ता है। फिर पीछे से लकड़ी के सहारे लपेटकर मांगा में लगाया जाता है। साड़ी में डिजाईन बनाने के लिए धागा को असारी में लपेटते हैं, उसके पश्चात ग्राफ से लकीर बनाते हैं, कपड़ा में लगाकर ग्राफ से डिजाईनों को बनाया जाता है। ग्राफ के हिसाब से कलर किया जाता है। उफन्ना में लपेटते है, उसके पश्चात पुनः आसारी में लपेटा जाता है। चरखा में असारी को लगाकर नाड़ा में फिर लपेटा जाता है। मांगा साड़ी बनाने का मशीन है उसके पनिया में सुखाया हुआ लम्बा धागा को एक-एक करके डालते हैं। उसके पश्चात नाड़ा लगाकर बुनाई का कार्य प्रारंभ करते हैं। रेशम और सूती, दोनों ही धागों से यह साड़ियां बनती हैं। वहीं इस मशीन की सहायता से एक बार में दो साड़ी बनता है। इस प्रक्रिया में साड़ी बनते तक एक सप्ताह तक का समय लग जाता है। इस कार्य में पूरा सदस्यों का योगदान रहता है। संबलपुरी साड़ी का रंग फीका नहीं पड़ता एक बार कपड़े को रंगे जाने के बाद इसे कभी भी दूसरे रंग में ब्लीच नहीं किया जा सकता है। कपड़े पतले और धीरे-धीरे खराब हो सकते हैं, लेकिन रंग कभी भी फीका नहीं पड़ता है। कपड़े रेशम और कपास दोनों में होते हैं। यह बहुमुखी तकनीक एक शिल्पकार को एक विचार या संदेश को प्रेरित करने में और कपड़े में रंगीन डिजाइन, पैटर्न और छवियों को बुनने में सक्षम बनाती है। साड़ी की विशेषता पुरानी होने पर संबलपुरी साड़ी का रंग और निखरता है। हर्बल रंगों के उपयोग से रंग फीका नहीं पड़ता। इसकी खासियत ने इस साड़ी को विशेष बनाया है। संबलपुरी साड़ियों में ज्यादातर पारम्परिक जैसे शंख, चक्र, पुष्प, पुरी के जगन्नाथ भगवान की डिजाइन होती हैं। हालांकि अब नए प्रयोग भी होने लगे हैं। ज्यामितीय आलेखन, पशु-पक्षी के डिजाइन भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं। संबलपुरी साड़ियों को शंख, चक्र, फूल जैसे पारंपरिक रूपांकनों के शामिल किए जाने के लिए जाना जाता है, जिनमें से सभी का गहरा प्रतीकवाद है। अलग-अलग डिजाईनों में रूपांकनों का उपयोग सीमाओं और पल्लू को सजाने के लिए भी किया जाता है। इस तकनीक में, थ्रेड्स को पहले टाई-डाई किया जाता है और बाद में एक कपड़े में बुना जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कई सप्ताह लगते हैं। संबलपुरी साड़ी एक हथकरघा पर बुने हुए कपड़े से बनाई जाती है और पूरे भारत में लोकप्रिय है।
























