महासमुंद

छेर-छेरा पर्व : अंचल में छेर – छेरा पर्व की धूम, धूम – धाम से मनाया गया पौष पुन्नी का पर्व

नंदकिशोर अग्रवाल, काकाखबरीलाल@ पिथौरा। छत्तीसगढ़ का खास लोकपर्व छेरछेरा, यह पौष पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह अन्न दान का महापर्व है। 6 जनवरी शुक्रवार को यह छेरछेरा पर्व धूमधाम के साथ मनाया गया। छत्तीसगढ़ में यह पर्व नई फसल के खलिहान से घर आ जाने के बाद मनाया जाता है। नगर सहित ग्रामीण अंचलों में शुक्रवार को छत्तीसगढ़ का पारंपरिक त्यौहार छेरछेरा पर्व बड़े ही धूमधाम से मनाया गया। पर्व को लेकर ग्रामीण अंचल केखास कर बच्चों में काफी उत्साह देखने को मिला। लोग झोला एवं बोरी ले के छेर छेरा मांगने के लिए अपने -अपने घरो से निकले। नगर के साथ गांव के दरवाजे पर बैठे महिलाओं पुरुषों ने छेरछेरा के रुप में धान के साथ यथासंभव रुपए तथा घरों में बनाए पकवान भी दिया । वही कई घरों के लोगों ने बच्चों को चाकलेट भी देते नजर आए।
ग्रामीण क्षेत्रों में इस त्यौहार को बड़े धूमधाम से उत्साह पूर्वक मनाया गया। इस दिन बच्चों से लेकर बड़े बुजुर्ग घर-घर जाकर छेरछेरा के रुप में धान मांगते रहे। लोग छेरछेरा के रुप में धान के साथ यथासंभव रुपए तथा चॉकलेट, घरों में बनाए पकवान भी देते रहे हैं। यह पर्व फसल मिसाई के बाद खुशी मनाने से संबंधित है। पर्व में अमीरी गरीबी के भेदभाव से दूर एक-दूसरे के घर जाकर छेरछेरा मांगते हुए कहते हैं छेरछेरा माई कोठी के धान ल हेरहेरा। मान्यता है कि धान के कुछ हिस्से को दान करने से अगले वर्ष अच्छी फसल होती है। इसलिए इस दिन किसान अपने दरवाजे पर आए किसी भी व्यक्ति को निराश नहीं करते। प्राचीन काल में राजा महाराजा भी इस पर्व को मनाते थे। छत्तीसगढ़ में प्राचीनकाल से छेरछेरा पर्व की संस्कृति का निर्वहन होते आ रहा है।लोगों के घरों में तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं। किसानों में इस पर्व को लेकर काफी उत्साह दिखा। दरअसल यह त्योहार खेती-किसानी समाप्त होने के बाद मनाया जाता है। इस अवसर पर लोग गांवों से बाहर निकलते नहीं हैं। गांव में रहकर ही इस पर्व को मनाते हैं। । वैसे इस पर्व की तैयारी सप्ताह भर पहले से शुरू हो गई थी। पूष पुन्नाी के रूप में प्रसिद्घ इस त्योहार में उड़िसा परंपरा के तहत निर्मित अरसा रोटी का विशेष महत्व माना जाता है। ग्रामीण बताते हैं कि अरसा के बिना त्योहार अधूरा प्रतीत होता है। पिथौरा क्षेत्र के साथ साथ आसपास के ग्रामीण अंचल में ब्यापक रूप से त्यौहार का देखा गया। और घर मे ही पूजा पाठ के साथ साथ मिठाइयों के साथ त्योहार मानते रहे।

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काका खबरीलाल

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