पिथौरामहासमुंद

​विलुप्त हो गई हमारी प्राचीन परंपरा ,  गाय बैल की संख्या हुई कम 

 ललित मुखर्जी ,पिथौरा    

 इन दिनों गाय एवं बैलों की संख्या काफी कम हो रही है |  आज से लगभग 20 वर्ष पगाय एवं बैलो   की संख्या काफी ज्यादा थी| यूं कहें कि ग्रामीण इलाकों में प्रत्येक घर में गाय एवं बहनों की  वास हुआ करती थी| इन्ही के सहारे समस्त किसान खेती करते थे|  खेत की जुताई करते थे, धान की मिसाई करते थे| परंतु अब ट्रेक्टर एवं हार्वेस्टर ने इनकी जगह ले ली है| जो काम बैलों से दिन भर में हुआ करती थी वही काम आज चंद घंटों में हो जाती है| वही पहले बैल के सहारे ही खेत की जुताई, धान की बियासी , धान की मिसाई   एवं सामानों की   ढुलाई बैलगाड़ी के सहारे मां की जाती थी| परंतु अब यह प्रथा अब पूरी तरह  विलुप्त होने के कगार पर है| इसका मुख्य कारण आधुनिक सुविधा एवं आधुनिक मशीन है| जिसके कारण अब गाय एवं बैलो  की संख्या में  काफी कमी हुई है काफी कमी हुई है|

         वही आज से कुछ वर्ष पहले ही गाय एवं बैलो  की मांग बहुत ज्यादा थी| जिसके कारण यह प्रजाति सुरक्षित था| परंतु अब इनकी पालन करना बहुत कम हो गई है| वही गाय और बैल क़त्ल खाने की ओर भी तेजी से जा रही है जिसके कारण इनके संख्या में लगातार कमी हो रही है|

                    एक रिपोर्ट की  माने तो आज से लगभग 20 वर्ष पूर्व ग्रामीण इलाकों में हर दूसरे घरों में गाय एवं बैलो  को पाला जाता था| जो कि आज की स्थिति में यह हर 15वें घरों में पाला जाता है| वही माने तो पहले एक गांव में चीन की जनसंख्या लगभग 300 से 500 हुआ करती थी वही आज 100 से ज्यादा नहीं है| इस तरह  यह प्रजाति तेजी के साथ कम हो रही है| 

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