बिजित ने विदेश की नौकरी का ऑफर छोड़ असम की चाय बेचना शुरू किया, अब सालाना 30 लाख टर्नओवर

असम के रहने वाले बिजित शर्मा ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। उनका कैंपस प्लेसमेंट भी हुआ था और एक मल्टीनेशनल कंपनी की तरफ से बढ़िया पैकेज भी मिल रहा था, लेकिन नौकरी करने की बजाय उन्होंने खुद का कुछ करने का फैसला किया।
अभी वे असम की चाय का स्टार्टअप चला रहे हैं। उनके साथ 200 से ज्यादा टी वर्कर्स जुड़े हैं। भारत सहित विदेशों में भी वे मार्केटिंग कर रहे हैं। हर महीने 3 हजार ऑर्डर्स आ रहे हैं। पिछले साल उनका टर्नओवर 30 लाख रुपए रहा।26 साल के बिजित की शुरुआती पढ़ाई-लिखाई असम में हुई। हरियाणा से उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। इसके बाद उन्हें एक मल्टीनेशनल कंपनी से बढ़िया ऑफर भी मिला, विदेश में काम करना था, लेकिन उन्होंने नौकरी जॉइन नहीं की। वे कहते हैं कि तब स्टार्टअप का दौर था। ज्यादातर युवाओं का फोकस नौकरी करने की बजाय खुद का कुछ करने पर था। मुझे भी नौकरी में दिलचस्पी नहीं थी। मैं भी चाहता था कि अपना स्टार्टअप शुरू करूं। मिडिल क्लास फैमिली से होने के कारण जॉब का ऑफर ठुकराना भी मुश्किल था। परिवार के लोगों का भी प्रेशर था।
वे कहते हैं कि मुझे पता था कि अगर अभी मजबूत फैसला नहीं ले पाया तो बाद में दिक्कत हो सकती है। एक दो साल बिना नौकरी के भी रहा जा सकता है। अगर स्टार्टअप कामयाब नहीं रहा तो वापस जॉब की जा सकती है, लेकिन एक बार नौकरी शुरू कर देने के बाद छोड़ना मुश्किल हो जाता है।बिजित कहते हैं कि असम की चाय खास होती है। बाहर के लोगों में इसकी डिमांड होती है। मेरे दोस्त अक्सर इसकी डिमांड करते रहते थे। कई लोग तो नियमित रूप से मुझसे असम की चाय मंगाते थे। इसलिए मुझे लगा कि अगर इस चाय को ही बेहतर तरीके से बेचा जाए तो अच्छी कमाई की जा सकती है। इसमें बिजनेस का अच्छा स्कोप है। साथ ही इसके जरिए चाय बागानों में काम करने वालों लोगों की लाइफ को भी बेहतर बनाया जा सकता है।
इसके बाद साल 2017 के अंत में बिजित ने असम के अलग-अलग चाय बागानों का रुख किया। वे टी वर्कर्स से मिले, उनके काम के प्रोसेस को समझा, उनकी दिक्कतें जानी। इसके बाद कुछ टी वर्कर्स को अपने साथ जोड़ा और फंड जुटाने की कोशिश शुरू की।
बिजित कहते हैं कि अपना बिजनेस मॉडल तैयार करने के बाद मैंने फंड जुटाने के लिए स्टार्टअप इंडिया और अलग-अलग इनक्यूबेटर्स के लिए अप्लाई किया। हालांकि ज्यादातर बार मेरा आवेदन रिजेक्ट हो गया। फिर भी मैंने कोशिश जारी रखी और हर जगह अपना मॉडल प्रजेंट करता रहा। आखिरकार 2017 के अंत में एक ऑर्गेनाइजेशन को हमारा आइडिया पसंद आया और हमें फंड भी मिल गया।
वे कहते हैं कि एक बार फंड मिलने के बाद मुझे पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ा। जैसे-जैसे काम करना शुरू किया अलग-अलग जगहों से फंड भी मिलता गया। असम सरकार की तरफ से भी तीन लाख रुपए की मदद मिली। फिर कुछ अपने तरफ से खर्च किया। कुल मिलाकर 6-7 लाख रुपए की लागत से हमारा सेटअप जम गया और Esah Tea नाम से अपना स्टार्टअप शुरू किया।
बिजित कहते हैं कि किसानों से टाईअप करने के बाद हमने मैन्युफैक्चरिंग शुरू की। इसके लिए असम में ही अपनी यूनिट लगाई। इसके बाद सोशल मीडिया और खुद की वेबसाइट बनाकर बेचने लगे। शुरुआत अपने परिचितों और रिश्तेदारों से की। फिर दूसरे लोगों को अप्रोच करना शुरू किया। भारत के मार्केट में जगह बनाने में हमें काफी मेहनत करनी पड़ी और वक्त भी लगा। यहां पहले से असम टी से जुड़े कई ब्रांड्स हैं, लेकिन इंटरनेशनल ऑर्डर जल्द ही मिलने लगे।
करीब एक साल बाद बिजित भारत के मार्केट में भी अपनी जगह बनाने में कामयाब रहे। उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों से ऑर्डर मिलने लगे। अभी वे हर महीने करीब 300 हजार से ज्यादा ग्राहकों तक अपना प्रोडक्ट पहुंचा रहे हैं। सोशल मीडिया और खुद की वेबसाइट के साथ ही अमेजन और फ्लिपकार्ट के जरिए वे मार्केटिंग कर रहे हैं। पिछले साल उनका टर्नओवर 30 लाख रुपए रहा है। इस साल 50 लाख रुपए से ज्यादा जाने की उम्मीद है।
अपने काम को लेकर बिजित कहते हैं कि हमारा मॉडल पूरी तरह ऑर्गेनिक है। यानी चाय से लेकर टीबैग और पैकेजिंग भी हम ऑर्गेनिक तरीके से ही करते हैं। इसके लिए हमने कुछ कॉटन की खेती करने वाले किसानों से करार किया है। हम टी बैग के रूप में कॉटन का ही इस्तेमाल करते हैं। इसके बाद उसमें चाय की पैकिंग की जाती है। इसके बाद उसकी मार्केटिंग का काम होता है।
वे बताते हैं कि फिलहाल हमारे पास 60 से ज्यादा वैराइटी की चाय हैं। इनमें ग्रीन टी, ब्लैक टी, वाइट टी, मसाला टी, रोज ब्लैक टी, लीची टी, इंग्लिश ब्रेकफास्ट टी जैसे प्लेवर शामिल हैं। 200 रुपए से इसकी शुरुआत होती है।
बिजित के साथ करीब 200 किसान जुड़े हैं। अब इनकी अच्छी आमदनी हो जाती है। साथ ही उनकी खुद की टीम में 10 लोग काम करते हैं। जल्द ही वे इसका दायरा बढ़ाने वाले हैं।
























