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सनातन धर्म में क्यों जरूरी है हवन – पं. शेषाचार्य जी महाराज

सनातन धर्म में किए जाने वाले पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है जिस प्रकार सब्जी में नमक अनिवार्य है ठीक उसी प्रकार पूजा पाठ मैं हवन अनिवार्य है सनातन धर्म में किया जाने वाला हवन यज्ञ के दौरान जब हम कुंड में अग्नि स्थापना करते हैं एवं यज्ञ करते हैं तब इसके माध्यम से हम भक्तजन अपनी इच्छाएं एवं कामनाओं को देवताओं तक पहुंचाते हैं यह एक माध्यम है कि यज्ञ में जब हम आहुति देते हैं इसी प्रक्रिया को हवन कहते हैं यज्ञ से हमारे आसपास की नेगेटिव एनर्जी एवं बुरी आत्मा का जो साया होता है वह नष्ट हो जाता है

वेद पुराण शास्त्रों मैं कहा गया है की अगर घर में सुख शांति समृद्धि वह स्वास्थ्य की कामना से यज्ञ हवन करना थे हमारे सनातन धर्म मैं प्रमुख माना जाता है लेकिन आज के इस आधुनिक समय में आने वाली पीढ़ी आधुनिकता की ओर बढ़ रही है और इन सब से विश्वास हटा रहे हैं इसीलिए वे अनेका अनेक परेशानियों से जूझ रहे हैं यज्ञ हवन करने से क्या लाभ होता है क्यों किया जाता है इसके बारे में सबको जानकारी होना चाहिए

वेदानुसार यज्ञ पांच प्रकार के होते हैं- ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, पितृयज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ और अतिथि यज्ञ। इसमें से देवयज्ञ ही अग्निहोत्र कर्म है। इसे ही हवन कहते हैं। यह अग्निहोत्र कर्म कई प्रकार से किया जाता है।

कर्म को आस्था के साथ जोड़ना तो ठीक है मगर इसका वैज्ञानिक कारण भी जानना बहुत ही आवश्यक है

हवन करने के लाभ व वैज्ञानिक कारण

राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान द्वारा किये गये एक शोध में पाया गया है कि पूजा —पाठ और हवन के दौरान उत्पन्न औषधीय धुआं हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट कर वातावरण को शुद्ध करता है जिससे बीमारी फैलने की आशंका काफी हद तक कम हो जाती है।

लकड़ी और औषधीय जडी़ बूटियां जिनको आम भाषा में हवन सामग्री कहा जाता है को साथ मिलाकर जलाने से वातावरण में जहां शुद्धता आ जाती है वहीं हानिकारक जीवाणु 94 प्रतिशत तक नष्ट हो जाते हैं।

1- हवन करने का एक वैज्ञानिक कारण भी हैं । एक रिसर्च में पता चला है की हवन में अधिकतर आम की लकड़ियों का ही प्रयोग किया जाता हैं, और जब आम की लकड़ियों को जलाया जाता है तो उनमें से औषधीय धुएं उत्पन्न होती है जिससे वातावरण में मौजूद खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणु खत्म हो जाते हैं । इसके साथ ही आसपास का वातावरण भी शुद्ध होता हैं, और अगर अग्णि में गुड़ को भी जलाया जाता हैं तो भी यह औषधीय धुएं उत्पन्न होती है ।इस औषधीय धुएं का वातावरण पर असर 30 दिन तक बना रहता है और इस अवधि में जहरीले कीटाणु नहीं पनप पाते

2-यदि आधे घंटे तक हवन में बैठा जाये और हवन के धुएं का शरीर से सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे जानलेवा रोग फैलाने वाले जीवाणु खत्म हो जाते है और शरीर शुद्ध हो जाता है ।

3- धार्मिक मान्यता के अनुसार घर में किसी भी तरह की नेगेटिव एनर्जी होने पर हवन करने से घर में पॉजिटिव एनर्जी आती है और घर का वातावरण भी शुद्ध होता हैं ।

 

4- हवन में प्रयोग की जाने वाली सामग्रियों का बहुत अधिक महत्व होता है, जब उनकी आहुति दी जाती है तो वें सुक्ष्म से सुक्ष्म विषाणुओं का नाश करने के काम करती हैं ।

5- हवन के धुएं के सम्पर्क में रहने से व्यक्ति के मस्तिष्क, फेफड़ें और श्वास सम्बन्धी समस्याएं भी नष्ट हो जाती है, जिसकी मदद से श्वसन तंत्र बेहतर तरीके से कार्य करने लगता है । साथ ही हवन के धुएं और अग्नि के ताप से शरीर की थकान और मन की अशांति भी दूर हो जाती है ।

6- यदि किसी व्यक्ति की राशि में ग्रहों की चाल खराब हो तो ऐसे लोगों को हवन करना चाहिए, यज्ञ की मदद से कुंडली के दोष का भी निवारण किया जा सकता हैं ।

7- हवन यज्ञ करके स्वस्थ और निरोगी जीवन तो मिलता ही है, साथ-साथ धार्मिक आस्था को भी बल मिलता हैं ।

अग्नि देव से प्राप्त होने वाली शिक्षा
◾अग्नि के निकट पहुँचकर लकड़ी, कोयला आदि साधारण वस्तुएँ भी अग्नि बन जाती हैं, हम अपनी विशेषताओ से निकटवर्ती लोगों को भी वैसा ही सद्गुणी बनाने का प्रयत्न करें।
◾जिस प्रकार अग्नि सदा गरम रहती है, कभी भी ठण्डी नहीं पड़ती, उसी प्रकार हमारी नसों में भी उष्ण रक्त बहना चाहिए, हमारी भुजाएँ, काम करने के लिए फड़कती रहें, हमारा मस्तिष्क प्रगतिशील, बुराई के विरुद्ध एवं अच्छाई के पक्ष में उत्साहपूर्ण कार्य करता रहे।
◾अग्नि की ज्वाला सदा ऊपर को उठती रहती है। मोमबत्ती की लौ नीचे की तरफ उलटें तो भी वह ऊपर की ओर ही उठेगी। उसी प्रकार हमारा लक्ष्य, उद्देश्य एवं कार्य सदा ऊपर की ओर हो, अधोगामी न बने।
◾हमारी देह, भस्मान्तं शरीरम् है। वह अग्नि का भोजन है। न मालूम किस दिन यह देह अग्नि की भेट हो जाय, इसलिए जीवन की नश्वरता को समझते हुए सत्कर्म के लिये शीघ्रता करें।

प्रायश्चित

होम- जप आदि करते हुए, आपन वायु निकल पड़ने, हँस पड़ने, मिथ्या भाषण करने बिल्ली, मूषक आदि के छू जाने, गाली देने और क्रोध के आ जाने पर, हृदय तथा जल का स्पर्श करना ही प्रायश्चित है।

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काका खबरीलाल

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