छत्तीसगढ़

राजस्व अभिलेखों में मात्राओं की गलती पाव की जगह पविया, दहाइत हो गया दहाईत, 30 हजार लोग सरकारी सुविधाओं से वंचित

शहर और आसपास के क्षेत्रों में बोलचाल की भाषा या मात्राओं की गलती के चलते आदिवासी और अनुसूचित जाति-जनजाति के हजारों लोगों को जाति प्रमाण पत्र की सुविधा से वंचित रहना पड़ रहा है। पुराने रिकॉर्ड, मिसल या अन्य दस्तावेजों में चढ़ी गलत जानकारी के चलते उन्हें भटकना पड़ रहा है। सरकारी सुविधाएं नहीं मिल रहीं।

दूसरी समस्याएं भी बरकरार हैं। वे बार-बार जनप्रतिनिधियों से गुहार लगा रहे हैं। मात्राओं की गलती बदलने की मांग कर रहे हैं। सरकारी चिट्ठियां भी चल रही हैं, पर अभी तक उनकी परेशानी यथावत हैं। यही कारण है कि उन्हें सरकार की ओर से मिले अधिकारों का लाभ नहीं मिल रहा और कोई उन्हें उनकी मूल जाति का मानने को भी तैयार नहीं है।

छत्तीसगढ़ कोल आदिवासी समाज सेवा संघ के प्रदेश अध्यक्ष युगल किशोर शांडिल्य ने विधानसभा अध्यक्ष को किए पत्राचार की प्रतिलिपि लगाकर कलेक्टर के सामने अपनी बात रखी है। इसमें कहा है कि बिलासपुर में कोल जनजाति के लोग बड़ी संख्या में निवास कर रहे हैं। उन्होंने इसके अनेक उपखंड के नाम लिखे हैं। इनमें रौतिया, ठकुरिया, रौतेल, कुरहा, बिंज, गढ़वरिया, खंगार कठौतिया, मवासी, कधरिया, खैरवार, कुलमंगन, भूमिया, मुरहा, गुंज, जैसी जातियों का उल्लेख किया गया है। उन्होंने बताया है कि दहाईत रौतिया का एक संभाग है। इन्हें सामाजिक पंचायत में मुखिया, देवांगन एवं कुरहा का पद होने के फलस्वरूप दहाईत/ दहाइत जाति के नाम से जाना जाता है। छत्तीसगढ़ राज्य का गठन होने के बाद राजपत्र से कोल दहाइत जाति को विलोपित कर दिया गया। जबकि अविभाजित मध्यप्रदेश में इन्हें सरकार का पूरा लाभ दिया जा रहा था। दहाइत और दहाईत कोल जाति समुदाय के लोग हैं और जाति प्रमाण पत्र की पात्रता रखने के बावजूद उन्हें इस सुविधा से वंचित होना पड़ रहा। राजस्व अभिलेखों में कुछ त्रुटियों के कारण विडंबना है कि इस समाज के लोग गंभीर दुष्परिणाम को झेल रहे हैं। उन्होंने जाति प्रमाण पत्र बनाने की मांग की गई है। लोगों की परेशानी को देखकर विधानसभा अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग दिल्ली को पत्राचार कर इन्हें उस दायरे में शामिल करने और नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है।

हमारे बच्चों का भविष्य अंधकार में
सोनझरी समाज के लोगों ने लिखा है कि वे 1954 से यहां के मूल निवासी हैं। उन्होंने बताया कि उनकी जाति का उल्लेख 1976 में छत्तीसगढ़ की सूची में अनुक्रमांक 16 पर अंकित है। संविधान के अनुच्छेद 342 के अधीन राज्य के संबंध में अनुसूचित जनजाति के रूप में विनिर्दिष्ट किया गया है। लेकिन भू-अभिलेख मिसल में सोनझरा होने के कारण उनके समाज का जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहा। उन्होंने इसे सोनझरी करने और मान्यता प्रदान करने की मांग की है।

जीवन स्तर नहीं सुधर रहा, परेशानी बरकरार
जाति प्रमाण पत्र नहीं होने से नौकरी में मिलने वाला आरक्षण नहीं मिल रहा। छात्रवृत्ति के दायरे में नहीं आ पा रहे। नौकरी में आवेदन भरने के शुल्क से लेकर समय-समय पर सरकार आदिवासी और अनुसूचित जाति-जनजाति के लोगों को कई सुविधाएं मुहैया करवाती हैं।

गजट नोटिफिकेशन के आधार पर बांटते हैं जाति प्रमाण पत्र
केंद्र और राज्य सरकार के राजपत्र और नोटिफिकेशन के आधार पर समाज के लोगों का जाति प्रमाण बनाया जा रहा है। इसमें बदलाव जैसी बात बड़े स्तर से ही संभव है। सरकारी निर्देश के अनुसार ही जाति प्रमाण पत्र आवंटित होने का काम जारी है।
-पुलक भट्‌टाचार्य, एसडीएम, बिलासपुर

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