राजनांदगांव

महिला युवा सरपंच ने गाँव में शिक्षा की अलख जगाने की ठानी… सैकड़ो बच्चे हो रहे लाभन्वित

राजनांदगांव (काकाखबरीलाल).डोंगरगढ़ विकासखंड के आदिवासी अंचल की नक्सल प्रभावित ग्राम पंचायत कन्हारगांव कि युवा महिला सरपंच ने अपने पति के साथ मिलकर गांव में शिक्षा की अलख जगाने का निर्णय लिया है। आदिवासी बाहुल्य के इस गांव में जहां ढाई हजार की आबादी में 25 बच्चे भी स्नातक की शिक्षा प्राप्त नहीं है। वहां के 12वीं पास 56 बच्चों को आधुनिक युग की मशीन कंप्यूटर का बेसिक प्रशिक्षण युवा सरपंच व उसके पति नि:शुल्क दे रहे हैं। 30 वर्षीय महिला सरपंच सरला साहू अपने 32 वर्षीय पति गंगाराम साहू के साथ गांव को शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बनाने के लिए दिन-रात प्रयास कर रहे हैं। गत चुनाव में गंगाराम ने दूसरे प्रत्याशियों की तरह चुनाव में पुल पुलिया व रोड सड़क बनाने का वादा तो नहीं किया पर उन्होंने यह वादा जरूर किया था कि वे अपने गांव को वहां के युवा बच्चों को कंप्यूटर की नि:शुल्क बेसिक शिक्षा प्रदान करेंगे। इसी तारतम्य में जीत के बाद वे अब हुए अपना वादा पूरा करने में लगे हैं।
कम्प्यूटर प्रशिक्षण के लिए ५६ बच्चों ने कराया रजिस्ट्रेशन
गंगाराम ने बताया कि गांव के 12वीं पास बच्चों में 56 ने अब तक उनके पास रजिस्ट्रेशन कराया है जिसमें 20 बच्चों को आगामी 20 दिनों तक कंप्यूटर की बेसिक ट्रेनिंग देकर उसके कंप्यूटर के बेसिक ज्ञान से अवगत कराकर उन्हें निपुण बनाया जा रहा है। 20 दिनों के बाद अगली टीम के 20 बच्चे पुन: नि:शुल्क प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे। 60 दिनों में इन 56 बच्चों को बेसिक शिक्षा प्रदान करने के बाद युवा सरपंच पति दसवीं पास बच्चों को इसका नि:शुल्क प्रशिक्षण देंगे ताकि आगे इन सैकड़ा भर बच्चों के लिए कंप्यूटर की शिक्षा के द्वार खुल सकेंगे। गंगाराम ने अपने गांव में अशिक्षा के अंधकार को दूर करने की ठान ली है इसके लिए वे अपने स्तर पर दिन रात प्रयास कर रहे हैं। वे प्रारंभ से ही गांव के निर्धन बच्चों को जिन की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण आगे की पढ़ाई बीच में ही छोड़ देते थे उन्हें शिक्षा के लिए प्रेरित कर उनका पूरा खर्चा उठारहे हैं। गत वर्ष 12वीं पास बच्चे को जो आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण आगे की पढ़ाई नहीं कर पा रहा था, का कॉलेज के फस्र्ट ईयर में एडमिशन करा कर पूरा खर्चा उन्होंने उठाया। इस वर्ष भी दो बच्चों का खर्च वे उठा रहे हैं। इस तरह गंगाराम ने एक अनूठी मिसाल पेश की है। गांव में शीघ्र हाईस्कूल खोलने की है योजना
गंगाराम की योजना गांव में अभिलंब हाईस्कूल खोलने की है, यहां प्राथमिक व पूर्व माध्यमिक विद्यालय तो वर्षों से संचालित हैं। कक्षा आठवीं के बाद अधिकांश बच्चे विशेषकर बच्चियां अपनी शिक्षा वहीं रोक देती हैं क्योंकि उनके पालक उन्हें गांव से बाहर अध्यापन के लिए नहीं जाने देना चाहते। यदि किसी तरह देवकट्टा जाकर बच्चियां हाईस्कूल तक पढ़ ले तो उसके बाद आगे की शिक्षा वहीं रुक जाती है। इसलिए गांव में हाईस्कूल खोलना अत्यंत आवश्यक है, सोच कर गंगाराम ने सरपंच प्रतिनिधि के रूप में जिलाधीश को आवेदन दिया तथा जांच की टीम नियुक्त कराया। अब जांच की टीम ने दौरा कर अपना प्रतिवेदन शासन को भेज दिया है, गंगाराम आशान्वित हैं कि जल्द ही आदिवासी बाहुल्य ग्राम के बच्चे हाईस्कूल की शिक्षा के लिए गांव से बाहर ना जाकर गांव में ही अध्यापन कर सकेंगे। पढ़ाई छोड़ चुके बच्चों को करा रहे अध्यापन
जो बच्चे रेगुलर यानी नियमित अध्यापन नहीं कर पाते उन्हें गंगाराम प्राइवेट शुल्क भरकर गांव में ही अध्यापन करा प्राइवेट परीक्षा दिलाने में भी लगे हैं। आगे चलकर उनकी योजना प्राइमरी व मिडिल स्कूल के बच्चों को कंप्यूटर के ज्ञान से अवगत कराने की है। यदि शासन का सहयोग रहा तो निश्चित रूप से बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों के बच्चों से अधिक निपुण कर सकेंगे। ग्रामीणों का मानना है कि बिना पैसे के शासकीय नौकरी नहीं मिल सकती?
गंगाराम ने बताया कि ढाई हजार आबादी वाले इस गांव में 10 से 15 लोग ही ऐसे हैं जिन्होंने स्नातक तक पढ़ाई की है। अशिक्षित लोगों का यह मानना है कि नौकरी बिना पैसे के नहीं मिलती इसलिए बच्चों को पढ़ा कर क्या करेंगे। जब उनके पास पैसा ही नहीं है तो नौकरी कैसे मिलेगी जबकि गांव में दो ही लोग ऐसे हैं जो शासकीय नौकरी पर हैं। गांव के 100 बच्चों को कंप्यूटर में बेसिक ज्ञान देकर वे आगे की पढ़ाई के लिए भी कौशल विकास के माध्यम से ट्रेनिंग देने प्रयासरत हैं। इसके लिए उन्हें जो भी करना पड़ेगा वे करने तैयार है। अब जरूरत यह है कि इस संकल्पित युवा जोड़े को शासन की ओर से सकारात्मक पहल की आवश्यकता दिखाई दे रही है। यदि शासन ने आदिवासी गांव के इस युवक को थोड़ी मदद की तो यह अशिक्षित गांव आगे चलकर विकासखंड ही नहीं जिले का नाम जरूर रोशन करेगा।

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