छत्तीसगढ़बसनामहासमुंद

क्षेत्र के उभरते कवि राकेश चतुर्वेदी की कलम से लिखित कविता : “धरती के प्यास बुझागे रे संगी”

काकाखबरीलाल, बसना(जमनिडिह)

धरती के प्यास बुझागे रे सँगी,
परत के देखतो पानी।
खाय बर दाना जगाले रे सँगी,
चार दिन के जिनगानी।।

रुख राही सबो हरिहर हरिहर,
जीवः जंतु सबो खुशियागे।
बूँद बूँद पानी गिरके सँगी,
माटी म खुशबू छागे।।
आकाश के गरजे बादर म,
डोंगरी के नाचे बानी।
धरती के प्यास बुझागे रे सँगी,
परत के देखतो पानी।।

धरती माता के छाती चीरे,
नांगर म चलाके।
दुःख पीरा सबो सहगे रे सँगी,
तोर ख़ुशी ल पाके।।
भाई भाई म देखतो सँगी,
डोली के करत हे निगरानी।
धरती के प्यास बुझागे रे सँगी,
परत के देखतो पानी।।

-कवि राकेश चतुर्वेदी(जमनीडीह)

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