श्रीराम का वनवास और दीपावली


रावण को जिस दिन श्रीराम ने मारा, वह दिन विजयादशमी अर्थात दशहरा के रूप में जाना जाता है। उसके बाद विभीषण के राज्याभिषेक के पश्चात अपने घर वापस लौटने में हरिराम को 20 दिन लग गए थे। कार्तिक अमावस्या के दिन उन्होंने अपने घर पर अपना पैर रखा और इस खुशी में पूरे अयोध्या राज्य में दीपोत्सव मनाया गया जिसे आज हम दीवाली के नाम से जानते हैं।
इतनी कहानी तो प्रायः सबको ज्ञात है। पर इससे आगे की कहानी आज के लिए बहुत रोचक और प्रेरणास्पद है। राम के गृह प्रवेश से शुरू हुई दीवाली उनके राज्याभिषेक तक निरंतर चली। इस अवसर पर भरत ने बड़ी धूमधाम से अपने बड़े भाई के राज्याभिषेक की तैयारी की। आज के दौर में जिस प्रकार शपथ ग्रहण समारोह के अवसर पर दूसरे देश की महान हस्तियों को बुलाया जाता है, ठीक ये परंपरा हमारे देश मे प्राचीन काल से चली आ रही है। उस वक़्त भरत ने भी सोचा कि क्यों न किसी को “चीफ़ गेस्ट” के रूप में आमंत्रित किया जाए। इस विषय में उन्होंने अपने भैया श्रीराम से बात करने की सोची। उनके पास जाकर भरत ने कहा कि आपका कोई मित्र या कोई ऐसा हितैषी है जो छूट गया है या जिसको विशेष आमंत्रण की आवश्यकता है, तो आप उनका नाम बता दीजिए ताकि उनको न्योता भिजवाया जा सके। राम ने कहा कि मेरे पास ऐसा कोई मित्र या हितैषी नही है जो “इगनोर” कर दिया गया हो। सुग्रीव, हनुमान, विभीषण आदि सब तो मेरे साथ ही यहां आए हुए हैं। कोई छूटा तो नही है। इस प्रकार की वार्तालाप के बाद सब लोग अपने अपने कार्यों में लग गए।
रात में विश्राम के समय जैसे ही श्रीराम जी को नींद आने ही वाली थी, कि अचानक से वो हड़बड़ा कर उठ गए। माता सीता उस समय तक जाग रही थी। उन्होंने पूछा कि क्या बात है, कोई “प्रॉब्लम” हो गयी क्या। श्रीराम ने जवाब दिया कि प्रिये, आज मुझसे बहुत बड़ा पाप होने वाला था, मुझे तुरंत ही भरत के पास जाना पड़ेगा। ऐसा कह कर वो भरत के विश्राम गृह की ओर चल दिये। भरत अपने भैया को आया जानकर तुरंत ही उठकर उनके सामने उपस्थित हुए। राम जी ने कहा, हे भरत, आज मुझसे बहुत बड़ा पाप हो जाता, मैंने सबको तो बुला लिया, पर एक मेरा मित्र रह गया है, जिसको न्योता देना अति आवश्यक है, और उसी को “चीफ गेस्ट” के रूप में बुलाया जा सकता है। राम जी ने भरत को उनका नाम बताया और भरत जी ने तत्काल उनको निमंत्रण भेजा।
राज्याभिषेक वाले दिन सब लोग उन “चीफ गेस्ट” का इन्तजार करने लगे। जब वो आये, तो सब लोग विस्मय की मुद्रा में उनको देखने लगे। वो आये, और आकर सीधा श्रीराम जी के सामने खड़े हो गए। पूरी सभा उन दोनों के भावों को समझने की कोशिश करने में लगी हुई थी।श्रीराम उनके सामने एक गरीब व्यक्ति की तरह खड़े हुए थे। बिल्कुल वैसे ही जैसे, विजय माल्या के सामने पी एन बी। वो चीफ गेस्ट और कोई नही, “केवट राज धीवर” थे, जिन्होंने श्रीराम को वनवास के समय गंगा पार कराया था और उनकी मित्रता स्वीकारी थी।
श्रीराम के पास उस दिन भी देने को कुछ नही था, और आज भी ऐसे खड़े थे मानो उनके पास देने के लिए कुछ भी नही है। पर कहते हैं न, कि नारी की आंखों में “स्कैनर” लगा होता है, तुलसी दास जी ने इस बात को कुछ यूं व्यक्त किया है: पिय हिय हित सिय जानन हारी। मुदित मगन मणि मुंदरी उतारी।।
सीता जी अपने पति के भाव को समझ गयी और तत्काल अपने हाथों से हीरे की अंगूठी उतार कर श्रीराम को दे दी ताकि वो उपहार स्वरूप केवट राज को दे सकें। ऐसा काम सिर्फ और सिर्फ भारत की नारियाँ कर सकती है।श्रीराम ने जब वो भेंट धीवर को दी तो उन्होंने लेने से साफ मना कर दिया। कहा मेरे इतने बड़े काम की इतनी छोटी कीमत, ना ना ना। मैं ये तो लूंगा ही नही। इस पर श्रीराम ने कहा कि ऐसे में तो तुम्हारा कर्ज मुझ पर निरंतर बना रहेगा। धीवर ने जवाब दिया नही, कर्ज तो मैं रहने नही दूंगा। पर कर्ज का भुगतान मेरे हिसाब से होगा। जिस प्रकार मैने तुम्हें गंगा से पार कराया, उसी प्रकार मेरे मृत्युपरांत तुम मुझे इस भवसागर से पार कराओगे, तभी मेरा हिसाब “क्लियर” होगा।
समस्त सभा खुशी और अश्रु पूर्ण भावों में बह गई।
“पुरानी दोस्ती को कभी नई ताकत से मत तोलो।। ये संबंधों की तुरपाई है षड्यंत्रों से मत खोलो।।
आप सभी को दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएं…
“इसमें मेरा कुछ भी नही है, मैंने केवल आपके सम्मुख प्रस्तुत किया है।” -पूनम प्रकाश प्रधान, भंवरपुर
























